चुनाव से पहले पाटीदार नेताओं का इस अंदाज में छिटकने के दो मायने निकाले जा सकते हैं. एक ये कि इन नेताओं को बीजेपी के साथ जुड़े रहने में अपना कोई सियासी फायदा नजर नहीं आ रहा. दूसरा, ये पाटीदार समाज के गुस्से से बचने का रास्ता भी हो सकता है.
अब जरा आंकड़ों के आइने में गुजरात में पाटीदारों का गणित समझिए. साढ़े 6 करोड़ की आबादी में 18 फीसदी वोटर पाटीदार-पटेल समुदाय से आते हैं. सूरत और आसपास के शहरों में पटेल समुदाय के नेताओं का अच्छा खासा दखल है. बीजेपी के लिए चिंता इस बात से भी बढ़नी चाहिए कि 2012 में जब पाटीदार समाज का बड़ा तबका नरेन्द्र मोदी के पीछे खड़ा था, तब भी बीजेपी और कांग्रेस के बीच 9 फीसदी वोटों का फासला था. और अब तो हालात ही दूसरे हैं.
हार्दिक पटेल ने जहां बीजेपी को लेकर अपना रुख साफ कर दिया है वहीं कांग्रेस को लेकर रास्ता पूरी तरह खुला हुआ है. आने वाले कुछ दिनों में इस पर कोई बड़ा ऐलान देखने को मिल सकता है. हार्दिक पटेल फैसला चाहे जो लें, एक बात तय है. गुजरात चुनाव में हार्दिक पटेल फैक्टर को नजरअंदाज करने वाले को भारी सियासी नुकसान उठाना पड़ सकता है.

















