जब बीजेपी के भीतर ये एहसास जज्ब होने लगा कि हार्दिक साथ नहीं आएंगे तब उसने दूसरे पाटीदार नेताओं से गलबहियों का सिलसिला शुरू किया. पहले साथ आए वरुण पटेल और रेशमा पटेल. दोनों युवा चेहरे हैं. पार्टी को लगा कि हार्दिक न सही दूसरे चेहरे सही. इस रणनीति के जरिए बीजेपी, पाटीदार आंदोलन को तोड़ने की फिराक में थी. लेकिन, ये दांव पार्टी को उल्टा पड़ सकता है. हार्दिक, बिना शक पाटीदार आंदोलन का सबसे बड़ा चेहरा हैं. रेशमा और वरुण का बीजेपी से उस वक्त हाथ मिलाना जब हार्दिक उसे झिड़क रहे हों, पटेल समुदाय के युवाओं के बीच कोई अच्छा संदेश भेजने वाला नहीं. रसी सही कसर नरेंद्र पटेल और निखिल सवानी ने पूरी कर दी. दोनों ने बीजेपी पर खरीद-फरोख्त का आरोप लगाया है. ‘पाटीदार अनामत आंदोलन समिति’ के नेता निखिल सवानी, 26 सितंबर को धूमधाम से बीजेपी में शामिल हुए थे. लेकिन, अब वो बीजेपी से बाहर हो चुके हैं. उन्होंने कहा कि बीजेपी के तमाम ऐलान चुनावी हथकंडा साबित हुए. नरेन्द्र पटेल तो बाकायदा प्रेस कॉन्फ्रेन्स कर कह चुके हैं कि उन्हें बीजेपी में शामिल होने के लिए एक करोड़ देने की डील हुई.


















