दाइश के क़ब्ज़े से इस शहर को आज़ाद कराने के लिए इस शहर पर अमरीका ने कार्पेट बम बरसाए और पूरे शहर को तहस नहस कर दिया।
लोग शहर छोड़कर भाग गए और जो बचे थे वह अमरीकी हमलों में इमारतों के मलबे के नीचे दफ़्न हो गए।
रक्क़ा को शहर कहने से बेहतर है, इसे भटकती आत्माओं का खंडहर कहा जाए, क्योंकि रक्क़ा में अगर कुछ बदला है तो केवल वहां लहराए जाने वाले झंडों का रंग। दाइश के काले झंडों की जगह अब कुर्द लड़ाकों के पीले झंडों ने ले ली है, हालांकि दोनों को हथियार और वित्तीय सहायता एक ही स्रोत से मिलती रही है, और वह है अमरीका।
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