गैरेज के अंदर आतंकियों ने हमें बंद करके छोड़ दिया। हमारे पास न खाने के लिए कुछ था और न पीने के लिए पानी था। मेरी यह हालत हो गई कि त्वचा कई जगहों से फट गई। मुझे वहीं पर बिच्छू ने डंक मारा लेकिन मुझे दर्द महसूस ही नहीं हुआ। कुछ दिन बाद हमारे दिमाग़ में सोचने समझने की सकत ही नहीं रह गई। गैरेज में हमने 21 दिन गुज़ारे। इसके बाद आतंकियों ने एक व्यक्ति को हमारी निगरानी पर लगा दिया। वह अच्छ आदमी था। जब आतंकी हमारा रेप करके चले जाते थे तो वह हमें पानी लेकर दे देता था। एक दिन उसने हमारे लिए दूख का भी बंदोबस्त किया जो बहुत स्वादिष्ट लगा।
















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