सियासी पंडित की अगर माने तो सियासत का ये खेल नया नहीं है, चुनाव जीतकर सियासत की कुर्सी पे विराजमान होते ही हर पार्टी ऐसा करती है, बेचारी मासूम जनता सब कुछ भूल के फिर वफादारी निभाने के लिए लाइन में लग जाती है फिर पांच साल तक उन्ही नेता के ज़ुल्म ओ सितम का शिकार होती है.
— बड़े अरमानों से सबने जिताया
फिर नोटबंदी ने ख़ून के आंसू रुलाया
ग़म अभी ताज़ा था उस पे GST का मरहम लगाया
सोचा अब कुछ अच्छा होने को है
बात ज्योँ की त्योँ रही क्योँकि बड़े कारोबारी ऐश करे, छोटे कारोबारी और ग़रीब जनता पर महंगाई की मार पड़ी


















