वोटों के भिकारी नेता घर- घर जा के वोट मांग रहे हैं, क़समें वादे करते ज़बान नहीं थक रही है, अभी चंद महीने की ही बात है जब इसी जनता जनार्दन के सहयोग से सियासत की कुर्सी पे विराजमान हुवे थे. उस वक़्त मानो ऐसा लग रहा था कि इनको बादशाहत विरसे में मिली हो, जनता के सहयोग को पल में दिक्कारते हुवे ऐसा जताते थे कि पहचानते ही न हो.

ख़ैर ऐसा करना सियासत के अखाड़े के दानिश्वरों के बांए हाथ का खेल रहता है, क्योँ कि अगर चुनाव जीतने के बाद भी जनता को याद रखा तो वक़्त- वक़्त पर इनकी मदद करना ज़रूरी हो जाएगा, इस लिए सियासी लीडर नया खेल शुरू करते है. ऐसे ताने बाने बुनते है जिसमे बेचारी जनता सब कुछ भूल कर नित नई परेशानी में उलझ जाती है,


















