शाहिद उस दर्दनाक हादसे को याद करते हुए बताते हैं कि कैसे उस हैवान भीड़ ने उनके पिता और चाचा को दौड़ा कर मार डाला। तब शाहिद रोज की तरह अपनी साइकिल पर सवार होकर रोजगार की तलाश में घूम रहे थे। बाबरी मस्जिद पर बात करते हुए शाहिद कहते हैं कि उनके दुख ने उन्हें और कठोर कर दिया है। इसलिए वो बाबरी मस्जिद की जमीन पर अपना दावा नहीं छोड़ेंगे।

शाहिद बताते हैं, ‘तब मैं महज 22 साल का था। हमारा घर आसानी से भीड़ का निशाना बन गया। क्योंकि ये मुख्य सड़क पर था। जब लोग आक्रोशित होकर चिल्लाते रहे थे। तब भीड़ में से किसी ने बताया कि यह घर मुस्लिम का है।



















