ऐसे में मेरे पिता और चाचा ने भागने की कोशिश की लेकिन भीड़ ने उनका पीछा किया और वो मारे गए। भीड़ ने हमारे रोजगार का मुख्य साधन रही आरा मशीन को आग लगा दी। उन्होंने सागौन और शीशम की लकड़ियों को आग के हवाले कर दिया। उन्होंने कुछ नहीं छोड़ा, सब जला दिया।’

शाहिद आगे बताते हैं कि उनके परिवार को पिता की मौत के बदले में दो लाख रुपए का मुआवजा मिला। जबकि हमारे परिवार में चार बहनें और छह भाई हैं। शाहिद कहते हैं, ‘चूंकि मैं घर में सबसे बड़ा था।



















