इसलिए सभी ने मुझसे मां और भाई-बहनों की देखभाल की उम्मीद की। मगर मुझे क्या करने की जरूरत थी? भीड़ ने सबकुछ तो जला दिया था। हमारी जिंदगियां तबाह कर दी थीं। इस बात को आज 25 साल हो गए। आज भी देखा जा सकता है कि जली हुई आरा मशीन में क्या बचा है। मैं अब बेरोजगार हूं। इसलिए मैं बाहर जाता हूं लोगों से रोजगार मांगता हूं। यहां कुछ दिन मुझे काम मिलता है।’
दूसरी तरफ बाबरी मस्जिद पर बात करते हुए शाहिद कहते हैं कि उनके दुख ने उन्हें और कठोर कर दिया है। इसलिए वो बाबरी मस्जिद की जमीन पर अपना दावा नहीं छोड़ेंगे। शाहिद कहते हैं, ‘जो मुसलमान अदालत के बाहर निपटारे की बात करते हैं वो बिक चुके हैं। लेकिन मैं सम्मान के बिना नहीं रह सकता।’



















