जब से अमरीकी संसद के दोनों सदनों में जास्टा क़ानून को स्वीकृति मिली है जिसके तहत आतंकवाद को संरक्षण देने वाली सरकारों के विरुद्ध अमरीका की अदालतों में मुक़द्दमा चलाया जा सकता है, उस समय से सऊदी अरब ख़ुद को बचाने की जुगत में लगा हुआ है। जास्टा क़ानून सऊदी अरब तथा फ़ार्स खाड़ी के कुछ अन्य अरब देशों को कटहरे में खड़ा कर सकता है जहां के नागरिक 11 सितम्बर के हमलों में शामिल थे और उनके तार सऊदी अरब के राजकुमारों से भी जुड़े हुए थे।
सऊदी अरब ने अमरीका की बड़ी लाबियों और राजनैतिक गलियारों के साथ लगातार बैठकें कीं ताकि सऊदी अरब की छवि को बेहतर किया जा सके। सऊदी अरब ने इस संदर्भ में अमरीका के पूर्व अधिकारियों और पत्रकारों की मदद ली और कहा कि रियाज़ सरकार हर नसीहत पर अमल करने के लिए तैयार है।
सऊदी अरब की कोशिश थी कि इन बैठकों से वह जास्टा क़ानून के बाद अमरीका में सऊदी अरब के ख़िलाफ़ बनने वाले वातावरण में कुछ नर्मी पैदा करे क्योंकि यदि अमरीकी न्यायपालिका ने 11 सितम्बर में अमरीकी राजकुमारों के लिप्त होने का फ़ैसला सुना दिया तो फिर सऊदी अरब का भविष्य पूरी तरह अमरीका के हाथ में होगा। सऊदी अरब की चिंता वाइट हाउस में ट्रम्प जैसे व्यक्ति की उपस्थिति के कारण और बढ़ गई जिनका मूड कब बदल जाए कुछ नहीं कहा जा सकता और जिन्होंने बग़ैर किसी झिझक के सऊदी अरब से सैकड़ों अरब डालर वसूल लिए।















