शहरनामा मुंबई ब्यूरो
मुंबई की पहचान केवल गगनचुंबी इमारतों, शेयर बाज़ार और फिल्मी दुनिया से नहीं है। इस शहर की असली रूह उन पुरानी गलियों, इमारतों और ईरानी होटलों में भी बसती है, जहाँ समय मानो ठहर-सा गया है। लकड़ी की पुरानी कुर्सियाँ, संगमरमर की मेज़ें, दीवार पर टंगी पुरानी घड़ी, काँच के जार में रखे बिस्कुट और रसोई से आती ताज़ी चाय की खुशबू—यह सब मिलकर मुंबई के उस दौर की याद दिलाते हैं, जब शहर को अभी “बॉम्बे” कहा जाता था।
उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में ईरान के यज़्द और करमान क्षेत्रों से अनेक पारसी और ईरानी परिवार रोज़गार की तलाश में मुंबई आए।
उन्होंने छोटे-छोटे कैफ़े और होटल खोले। इन होटलों ने जल्दी ही अपनी सादगी, स्वाद और अपनत्व के कारण हर वर्ग के लोगों का दिल जीत लिया। यहाँ उद्योगपति भी बैठते थे और टैक्सी चालक भी, कॉलेज के छात्र भी आते थे और लेखक, पत्रकार तथा कलाकार भी।
ईरानी होटल की सबसे बड़ी पहचान उसकी कटिंग चाय, बन-मस्का, ब्रून मस्का, अकूरी, बेरी पुलाव, मावा केक और ताज़ा बेकरी का सामान रहा है। सुबह की शुरुआत हो या शाम की गपशप, इन होटलों की मेज़ों पर केवल चाय नहीं परोसी जाती थी, बल्कि शहर की राजनीति, साहित्य, क्रिकेट और फ़िल्मों पर घंटों चर्चा होती थी।
बैलार्ड एस्टेट का ब्रिटानिया एंड कंपनी अपने बेरी पुलाव के लिए विश्व प्रसिद्ध रहा, जबकि मरीन लाइंस के पास कयानी एंड कंपनी का बन-मस्का आज भी लोगों को बरसों पुरानी यादों में ले जाता है। फ़ोर्ट का कैफ़े एक्सेल्सियर और धोबी तलाव की यज़दानी बेकरी आज भी विरासत की तरह अपनी पहचान बचाए हुए हैं।
समय के साथ बहुत कुछ बदल गया। मॉल, कॉफी चेन और फास्ट फूड संस्कृति ने इन पुराने होटलों के ग्राहकों को प्रभावित किया। बढ़ते किराए, विरासत भवनों के रखरखाव का खर्च और नई पीढ़ी की बदलती जीवनशैली के कारण कई ईरानी होटल हमेशा के लिए बंद हो गए। जो बचे हैं, वे केवल व्यवसाय नहीं चला रहे, बल्कि मुंबई की सांस्कृतिक धरोहर को भी जीवित रखे हुए हैं।
एक पत्रकार के रूप में मुझे लगता है कि ईरानी होटल केवल खाने-पीने की जगह नहीं, बल्कि शहर की सामाजिक बराबरी का प्रतीक हैं। यहाँ कभी किसी की हैसियत नहीं पूछी जाती थी। एक ही मेज़ पर वकील, मज़दूर, व्यापारी और विद्यार्थी बैठकर चाय पीते थे। शायद यही मुंबई की सबसे खूबसूरत पहचान है।
आज जब आधुनिक मुंबई तेज़ी से बदल रही है, तब ये पुराने ईरानी होटल हमें याद दिलाते हैं कि शहर केवल कंक्रीट की इमारतों से नहीं बनता, बल्कि उन जगहों से बनता है जहाँ इंसान मिलते हैं, बातें करते हैं और यादें बनाते हैं।















