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लखनऊ को केवल इमामबाड़ों, रूमी दरवाज़े या नवाबी इमारतों से नहीं पहचाना जा सकता। इस शहर की असली पहचान उसकी गलियों में बसती है। चौक, नक्खास, अकबरी गेट, गोलागंज और पुराने लखनऊ की संकरी गलियाँ आज भी सदियों पुराने इतिहास, तहज़ीब और अपनत्व की गवाह हैं।
इन गलियों की एक अलग दुनिया है। सुबह होते ही ताज़ी शीरमाल और कुलचों की ख़ुशबू हवा में घुल जाती है। पान की दुकानों पर महफ़िलें सजती हैं, इत्र की महक राहगीरों को अपनी ओर खींचती है और चिकनकारी तथा ज़रदोज़ी के कारीगर अपने हुनर से कपड़ों में जान डालते दिखाई देते हैं।
पुराने लखनऊ की अनेक गलियों के नाम कभी वहाँ होने वाले पेशों और कारोबार से जुड़े थे। जैसे पान वाली गली, वरक वाली गली, चूड़ी वाली गली और फूल वाली गली। ये नाम आज भी उस सांस्कृतिक और व्यावसायिक विरासत की याद दिलाते हैं जिसने इस शहर की पहचान बनाई।
इन गलियों की सबसे बड़ी पहचान केवल उनकी बनावट नहीं, बल्कि उनकी तहज़ीब है। यहाँ आज भी बड़े-बुज़ुर्गों को अदब से सलाम किया जाता है, मेहमान का स्वागत दिल खोलकर होता है और त्योहारों में गंगा-जमुनी संस्कृति की खूबसूरत झलक दिखाई देती है।
मोहर्रम की मजलिसें हों, ईद की रौनक हो या होली और दीवाली का उत्साह—इन गलियों ने हमेशा मेल-मिलाप का संदेश दिया है।
बदलते समय के साथ लखनऊ का विस्तार हुआ है। चौड़ी सड़कें, मेट्रो और आधुनिक कॉलोनियाँ शहर का नया चेहरा हैं, लेकिन पुराने लखनऊ की गलियाँ आज भी अपनी रूह को सँभाले हुए हैं। इन गलियों में चलना केवल एक रास्ते से गुज़रना नहीं, बल्कि इतिहास के पन्नों के बीच से होकर गुज़रना है।
लखनऊ की गलियाँ हमें याद दिलाती हैं कि किसी शहर की पहचान उसकी ऊँची इमारतों से नहीं, बल्कि उसकी संस्कृति, उसके लोगों और उसकी यादों से बनती है। जब तक ये गलियाँ आबाद हैं, तब तक लखनऊ की तहज़ीब भी ज़िंदा रहेगी।














