ज़ाहिर है अदालतें कहानियों पर फैसले नहीं सुनातीं. कहानियों के साथ कहानियों को जोड़ने वाले पात्र और सबूत भी होने चाहिएं. और इस मामले में वही नहीं था. बस इसीलिए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सीबीआई की तमाम कहानियों को अनसुना करते हुए निचली अदालत के फैसले को पूरी तरह से पलट दिया.
हालांकि कहने वाले अब भी कह सकते हैं कि अदालत ने शक का लाभ देते हुए तलवार दंपति को रिहा किया है. तो फिर इस दलील पर भी ये सवाल उठेगा और हरेक ज़ेहन को झकझोरता रहेगा और वो ये कि क्या कोई मां-बाप अपनी ही बेटी का कत्ल करने के बाद पूरे नौ साल चार महीने और 28 दिन तक अपने खूनी जुर्म, अपने दोहरे ज़ज्बात और खोखली भावनाओं को यूं छुपा सकते हैं? अगर डाक्टर राजेश तवलार और नूपुर तलवार सचमुच अपनी बेटी के कातिल हैं तो फिर यकीनन दोनों बेहतरीन अदाकार भी थे.



















