शहरनामा लखनऊ ब्यूरो
अवध की ज़मीन पर जब मोहर्रम का चाँद दिखाई देता है तो केवल गामी का महीना शुरू नहीं होता, बल्कि सदियों पुरानी एक ऐसी सांस्कृतिक परंपरा भी जीवंत हो उठती है जिसने धर्म की सीमाओं से आगे बढ़कर इंसानियत, सम्मान और साझी विरासत का संदेश दिया है।
लखनऊ की अज़ादारी विश्वविख्यात है, लेकिन उसी अवध की एक और ऐतिहासिक धरोहर है—महमूदाबाद रियासत का मोहर्रम।
सीतापुर ज़िले की महमूदाबाद रियासत में मनाया जाने वाला मोहर्रम केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति और गंगा-जमुनी तहज़ीब का ऐसा संगम है, जिसकी मिसाल आज भी पूरे उत्तर भारत में दी जाती है।
रियासत और अज़ादारी का रिश्ता
महमूदाबाद रियासत का इतिहास कई शताब्दियों पुराना है। अवध के नवाबी दौर में यह रियासत राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत प्रभावशाली मानी जाती थी।
रियासत के शासकों ने शिक्षा, साहित्य और धार्मिक संस्थाओं के साथ-साथ अज़ादारी को भी संरक्षण दिया। इसी संरक्षण ने महमूदाबाद के मोहर्रम को एक विशिष्ट पहचान प्रदान की।
रियासत के इमामबाड़े, अलम, ताबूत और जुलूस आज भी उस ऐतिहासिक विरासत की गवाही देते हैं जिसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी सहेजकर रखा गया है।
जहाँ धर्म के साथ संस्कृति भी चलती है
महमूदाबाद के मोहर्रम की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि यहाँ अज़ादारी केवल एक समुदाय तक सीमित नहीं रही।
स्थानीय हिंदू परिवारों ने भी वर्षों तक जुलूसों की व्यवस्था, सबील, ताज़ियों की सजावट और मेहमाननवाज़ी में सक्रिय भागीदारी निभाई।
कई परिवार अपने पूर्वजों की परंपरा निभाते हुए आज भी मोहर्रम के दिनों में श्रद्धा के साथ सेवा करते हैं। यही वह परंपरा है जिसे अवध की गंगा-जमुनी तहज़ीब कहा जाता है—जहाँ आस्था अलग हो सकती है, लेकिन सम्मान साझा होता है।
मेहंदी का ऐतिहासिक जुलूस
महमूदाबाद की पहचान उसके ऐतिहासिक मेहंदी जुलूस से भी जुड़ी है। यह जुलूस सदियों से पारंपरिक मर्यादा और अनुशासन के साथ निकाला जाता है। इसमें शामिल धार्मिक प्रतीक, अलम और ताबूत स्थानीय लोगों के लिए गहरी श्रद्धा का विषय होते हैं।
पुराने समय से रियासत के राजा स्वयं नंगे पाँव चलकर इस आयोजन में शामिल होते थे।
मौजूदा राज्य डाक्टर अली खान महमूदाबाद उसी परंपरा को बड़ी पाबंदी से निभाते हैं। मरहूम राजा साहब सुलेमान मियां ने हमेशा अपनी रिआया से मोहब्बत का सुलूक किया,जिसके कारण आज भी मोहर्रम के जुलूसों मैं भारी भीड़ होती है, विशेष कर आठवींय रबीउलाव्वल को महमूदाबाद की करबला और क़िले मे सोगवारों का हुजूम देखने वाला होता है
इसे सत्ता नहीं, बल्कि विनम्रता और सम्मान का प्रतीक माना जाता था।
अदब और अख़लाक़ की विरासत
अवध की पहचान केवल उसकी इमारतों से नहीं, बल्कि उसके अदब, अख़लाक़ और मेहमाननवाज़ी से रही है। महमूदाबाद का मोहर्रम भी इन्हीं मूल्यों को आगे बढ़ाता है।
यहाँ आने वाले ज़ायरीन का स्वागत, सबीलों की व्यवस्था, नौहाख़्वानी की गंभीरता और जुलूसों का अनुशासन इस बात का प्रमाण हैं कि धार्मिक आयोजन भी सामाजिक संस्कारों के वाहक हो सकते हैं।
बदलते दौर की चुनौतियाँ
समय के साथ जीवनशैली बदली है। रियासतें इतिहास का हिस्सा बन चुकी हैं, नई पीढ़ी की प्राथमिकताएँ भी बदल रही हैं। फिर भी महमूदाबाद के लोग अपनी इस सांस्कृतिक धरोहर को बचाए रखने का प्रयास कर रहे हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि इस विरासत को केवल धार्मिक दृष्टि से नहीं, बल्कि भारत की साझा सांस्कृतिक धरोहर के रूप में भी संरक्षित किया जाए।
विरासत जिसे संजोना ज़रूरी है
महमूदाबाद का मोहर्रम हमें यह याद दिलाता है कि भारतीय समाज की असली ताक़त उसकी विविधता और परस्पर सम्मान में है। इमाम हुसैन की शहादत का संदेश न्याय, सत्य और इंसानियत का संदेश है, और उसी भावना ने अवध की धरती पर ऐसी परंपराएँ जन्म दीं जहाँ विभिन्न समुदायों ने मिलकर एक-दूसरे की आस्थाओं का सम्मान किया।
आज जब समाज में संवाद और सद्भाव की आवश्यकता पहले से अधिक महसूस की जा रही है, तब महमूदाबाद की यह परंपरा एक प्रेरणा बनकर सामने आती है। यह केवल एक रियासत की कहानी नहीं, बल्कि उस भारत की कहानी है जहाँ संस्कृति और इंसानियत मिलकर इतिहास रचती हैं।
























