जब नवाबों के शहर में जलते थे कैमरों के आर्क लैंप
आज जब फिल्म सिटी की बात होती है तो लोगों के ज़ेहन में सबसे पहले मुंबई या नोएडा आते हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि लगभग सौ वर्ष पहले लखनऊ भी फिल्म निर्माण के नक्शे पर अपनी जगह बना चुका था।
वर्ष 1926 में विधान सभा मार्ग पर एक आधुनिक फिल्म स्टूडियो की स्थापना हुई, जिसे पहले Ideal Studio और बाद में Kailash Studio के नाम से जाना गया। यह उत्तर भारत के शुरुआती फिल्म स्टूडियो में गिना जाता है।
इस स्टूडियो की स्थापना अवध के कुछ प्रतिष्ठित ज़मींदारों और रियासतों के सहयोग से हुई थी। इनमें राजा साहब मौरावां और राजा साहब ओयल जैसे नाम शामिल बताए जाते हैं। उस दौर में उद्देश्य था कि लखनऊ की तहज़ीब, संगीत, नृत्य और अदब को फिल्मों के माध्यम से देश-दुनिया तक पहुँचाया जाए।
हालाँकि, शुरुआती उत्साह के बावजूद यह सपना ज़्यादा समय तक परवान नहीं चढ़ सका। फिल्म उद्योग का केंद्र तेज़ी से बंबई (अब मुंबई) बन गया। बेहतर तकनीक, बड़े निवेश और कलाकारों के पलायन के कारण लखनऊ का यह स्टूडियो धीरे-धीरे गुमनामी में खो गया। आज उसकी चर्चा केवल इतिहास के कुछ पन्नों और पुराने शोधों में मिलती है।
फिर भी लखनऊ का फिल्मों से रिश्ता कभी टूटा नहीं। शहर की इमारतें, इमामबाड़े, रूमी दरवाज़ा, पुराने मोहल्ले और नवाबी माहौल लगातार फिल्मकारों को आकर्षित करते रहे। जुनून, सावन को आने दो, सेहर और बाद में गुलाबो सिताबो जैसी फिल्मों ने लखनऊ की इस विरासत को नई पहचान दी।
शाहरनामा की टिप्पणी:
अगर उस दौर का Ideal/Kailash Studio लगातार चलता रहता, तो संभव है कि आज लखनऊ भी भारतीय सिनेमा का एक बड़ा केंद्र होता। इतिहास की यह भूली हुई इमारत हमें याद दिलाती है कि नवाबों का शहर केवल अदब और तहज़ीब का नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा के शुरुआती सपनों का भी गवाह रहा है।

















