
” इतिहास व्यक्ति में घटित होने वाला हर घटना शुरुआत ‘मध्य और अंत नहीं रखता … लेकिन टाइटैनिक ढाँचा इस विशेषता रखता है। घटना शुरू यात्रा शुरू होने पे हुआ ‘जब हिमस्खलन से टकराया तो मध्य हूं और जब जहाज डूबा’ तो अंत हो गया। ”
यह 1985 की बात है कि रॉबर्ट बालराड नामक एक अमेरिकीओसेनोग्राफ ने टाई टैंक ढाँचा पूछा। रॉबर्ट साहब टाई टैंक खोजने नहीं निकले थे ‘यह डूबने जहाज तो’ ‘तके’ ‘में मिला। रॉबर्ट दरअसल अमेरिकी नौसेना के एक गुप्त मिशन में शामिल था। इस मिशन के माध्यम से शीत युद्ध के दौरान नार्थ अटलांटिक ओशियन में विसर्जित होने वाली अमेरिकी परमाणु पनडुब्बियों ढूंढना गंतव्य था। परमाणु पनडुब्बियों खोजते करते रॉबर्ट टाई टैंक संरचना तक पहुंच गया।
तीस साल पहले जब दो टुकड़ों में विभाजित टाई टैंक ढाँचा डिस्कवर हुआ ‘तो वह खासी संरक्षित हालत में था। यह लगभग साढ़े बारह हजार फीट की गहराई में तह समुद्र पड़ा है। इसमें मछलियों और अन्य जलीय जानवरों ने अपने निवास बना लिया था ‘हालांकि चालक अक्सर हिस्से साफ पहचानते लिए गए। सात साल बाद पता चला कि टाई टैंक संरचना पर तो इस्पात खाने वाले जीवों ने हमला कर दिया है।
हुआ यह कि 1991 में कनाडा के कुछ जिज्ञासु वैज्ञानिक भारी निवेश ख़र्च करके तह समुद्र पहुंचे ताकि टाई टैंक पर्यटन कर सकें। दौरान पर्यटन उन्होंने संरचना जंग के नमूने भी खर्च को। वह जहाज इस्पात का रासायनिक विश्लेषण करना चाहते थे। जब नमूने माइक्रोस्कोप के नीचे रखे गए ‘तो प्रकट हुआ कि उनमें तो रोगाणु कालोनियों बसे चुकीं।
कनाडा वैज्ञानिक बगरज़ अनुसंधान टाई टैंक देखने नहीं गए थे। इसलिए वे कीटाणुओं देखकर हैरान तो हुए मगर उन्होंने अपना काम आगे नहीं बढ़ाया।
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