हुनर-ए-ज़िंदगी
By Prof Nehal Uddin Ahmad
साहिल से जुदाई का ग़म भी नहीं होता,
अगर लहरों को चीरने का हुनर आता हो।
मुश्किल सफ़र भी आसान हो जाते हैं,
अगर हौसला देने का हुनर आता हो।
दिल की दुनिया में कोई तन्हा नहीं रहता”
अगर प्यार को समझने का हुनर आता हो।
अल्फ़ाज़ की फिर कभी कमी नहीं रहती,
अगर ख़ामोशी सुनने का हुनर आता हो।
मंज़िल पे पहुँचने में देर नहीं लगती है,
अगर राह को चुनने का हुनर आता हो।
तनहाई का कभी भरम नहीं होता,
अगर ख़ुद से मिलने का हुनर आता हो।
आँखों में ग़मों का बोझ नहीं रह पाता,
अगर मुस्कुराने का हुनर आता हो।
दुनिया में दुश्मनी हो ही नहीं सकती,
अगर इंसानियत का हुनर आता हो।
क़िस्मत भी सितमगर न लगे दुनिया में,
अगर वक़्त को समझने का हुनर आता हो।
ग़म की वो अंधेरी रात भी कट जाती है,
अगर सब्र से जीने का हुनर आता हो।
तूफ़ानों से डर किसे लगे दुनिया में,
अगर पतवार चलाने का हुनर आता हो।
नफ़रत का ज़हर भी असर नहीं करता,
अगर मोहब्बत बाँटने का हुनर आता हो।
क़ाफ़िला-ए-नाव भी साहिल पे पहुँच जाता है,
अगर नाख़ुदा को मल्लाही का हुनर आता हो।
‘नेहाल’ इश्क़ के मरहले भी पार हो जाते हैं,
अगर दर्द को हँस के सहने का हुनर आता हो।
Prof Nehaluddin Ahmad, LL.D. Professor of Law, Sultan Sharif Ali Islamic University (UNISSA), Brunei, email: ahmadnehal@yahoo.com

















/odishatv/media/media_files/2026/04/19/billionaire-entrepreneur-2026-04-19-23-55-02.jpg)


