Lucknow : 21वीं रमजान मौला ए कायनात अली इब्ने अबि तालिब अ0 स0 की शहादत का जुलूस अकीदत और एहतराम के साथ निकला, मोमेनीन सियाह लिबास पहने आंसुओं के सैलाब के दरम्यान मौला की आख़िरी रुक्सत के लिए ज़ार ओ क़तार रो रहे थे, बताते चलें की मौला इमाम अली अ0 स0 के ताबूत में शिरकत करने के लिए सिर्फ लखनऊ ही नहीं बल्कि आस पास, शहर व क़स्बे से मोमेनीन यहाँ आते हैं |

File Photo ( Azam Husain )
हजरत अली की शहादत की याद में 21वीं रमजान को शबीह-ए-ताबूत का जुलूस सोमवार सुबह की नमाज के बाद शबीए-ए-नजफ रुस्तम नगर से कर्बला तालकटोरा तक ले जाया गया।
रास्ते में या अली मौला, हैदर मौला की सदाओं से माहौल गमगीन हो उठा । अकीदतमंद अमीरउल मोमनीन हजरत अली के ताबूत को बढ़चढ़ कर बोसा दे रहे थे । इस दौरान शांति व्यवस्था एवं जुलूस की सुरक्षा के मद्देनजर चप्पे-चप्पे पर पुलिस बल की तैनाती की गई थी । साथ ही पुलिस व प्रशासन के आलाधिकारी मौजूद रहे ।

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जुलूस रोजा-ए-काजमैन थाना सआदतगंज से शुरू होकर मंसूर नगर तिराहा, गिरधारी सिंह कुंवर इण्टर कॉलेज, टुडिय़ागंज तिराहा से दायें मुड़कर बाजारखाला, हैदरगंज, होते हुए तालकटोरा जाकर समाप्त हुआ । जुलूस जहां से निकल रहा था, लोग अपने घरों की छत से भी ताबूत की जियारत कर रहे थे ।
रास्ते में याली मौला और हैदर मौला की सदाओं से माहौल गमगीन हो उठा। अकीदतमंद अमीरउल मेनीन हजरत अली अलैहिस्सलाम के ताबूत को आगे बढ़चढ़ कर बोसा दे रहे थे।

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हजरत अली की शहादत का जुलूस से पहले मुख़्तसर मजलिस हुवी मजलिस के बाद शहर की मातमी अंजुमने नौहाख्वानी और सीनाजनी करते हुए चले। इनमें मर्द ख्वातिनो के साथ साथ नन्हे नही बच्चे हाय अली अ0.स0, हाय अली अ0.स0 की सदा बुलंद करते नज़र आ रहे थे.
बताते चले की इस ताबूत को हसन मिर्ज़ा के ख़ानदान की महिलाएं मातम करती सीना ज़नी करती हुवी मर्दो को सौंपती हैं गौरतलब है कि ताबूत इमाम अली अस को .उन्नीस रमजान की सुबह से मर्दों की ज़ियारत करने की व्यवस्था की गई थी। 20 रमजान को 11 बजे से सिर्फ महिलाओं के लिए ज़ियारत करने का इंतजाम किया जाता है,
जो 21 रमजान की सुबह तक जारी रहता है। इसके बाद यहां अलविदाई मजलिस होती है, फिर महिलाएं ताबूत को रौजे से निकाल कर मर्दों के सुपुर्द कर देती हैं। यह ताबूत जुलूस की शक्ल में विभिन्न रास्तों से गुजरता हुआ कर्बला तालकटोरा जाता है। वहां इसे बड़ी अकीदत के साथ दफन किया जाता है।
हजरत अली अलैहिस्सलाम के ताबूत का किया है इतिहास
144 साल पूर्व यानी 21 रमजान साल 1870 में हसन मिर्जा ने मौलवीगंज स्थित रस्सी बटान से हजरत अली अलैहिस्सलाम की शहादत की याद में ताबूत का जुलूस निकालना शुरू किया, जो बड़ा मकबूल हुआ। साल 1873 से उन्होंने ताबूत को रुस्तम नगर स्थित अपनी ससुराल से उठाना शुरू किया।
पांच मोहर्रम साल 1930 को हसन मिर्जा का निधन हो गया। इसी साल शबीह नजफ की बुनियाद भी डाली गई। हसन मिर्जा के निधन के बाद यह ताबूत उठाने का कार्य उनके दामाद अफजल हुसैन ने 1930 से 1945 तक बखूबी अंजाम दिया।
1946 से अब तक हसन मिर्जा के घराने के लोग लाखों अकीदतमंदों के साथ ताबूत उठाते रहे हैं। साल 1873 में यह ताबूत का जुलूस रूस्तम नगर, कश्मीरी मोहल्ला, पुल गुलाम हुसैन, महमूद नगर, चावल वाली गली, नक्खास चौराहा, बिल्लौचपुरा, हैदरगंज और बुलाकी अडडा होते हुए कर्बला तालकटोरा जाता था। 1969 में लखनऊ में शिया-सुन्नी फसाद होने के कारण इस ताबूत के जुलूस पर सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया। उसके बाद 1974 और 1977 में सरकार ने जुलूस निकालने की अनुमति दी।