By Professor Nehal Uddin Ahmad
न था कोई नाम, न कोई शक्ल, न चेहरा था,
वो सजदों में भी था, अश्कों में भी बहता था।
हर धड़कन की लय में, हर साँस की सरगम में,
वो छुपा कोई नग़मा था, जो रगों में बहता था।
हम उसे मस्जिदों, मंदिरों, गिरजाघरों में ढूँढते रहे,
वो तो हर दिल के अंदर उसी की शक्ल में बैठा था।
न कोई तर्ज़ था, न वज़्न, न अल्फ़ाज़ के जामे,
वो हर ख़ामोशी में एक कलाम सा बहता था।
वह ग़रीब की भूख में था, मासूम के दूध में था,
वह बीमार की टीस में था, हकीम की दवा में था,
वो मज़दूर के पसीने में था, किसान की जोत में था,
वो ग़रीब के हौसले में था, रोज़ की जद्दोजहद में था।
वो मूसा की आवाज़ में , फ़िरऔन के दरबार में था।
बुध के बोधि ज्ञान में था, वही सातो आसमान में था।
जो जब्र के मक्तल में था, ईसा की सलीब में था,
वो हुसैन की तश्नगी में था, कृष्ण के चक्र में था।
मस्जिद की अज़ान में था, मंदिर की घंटियों में था,
वो माँ के आँचल में था, फ़क़ीर की फूँक में था।
वो गंगा की रवानी में था, आबे-ज़मज़म के यक़ीन में था,
नूह की कश्ती में था , वही अबला की आबरू में था।
वो मीरा की तान में था, राबिआ की फ़रियाद में था,
कभी कबीर के दोहे में, वही मंसूर की आवाज़ में था।”
हम उसे ढूँढते रहे कहाँ-कहाँ, ना वो किताबों में था,
वो हर मासूम हँसी में था, हर आँसू और दर्द में था।
जिसे लोगों ने खुदा समझा, या पत्थर बना डाला,
वो भूखे के सब्र में था, मज़दूर की थकन में था ।
वो मज़लूम की सिसकियों में था, हर ख़ामोश चुप में था,
जो ज़ुल्म के आगे खड़ा था वो ,ही रब था, वो ही खुदा था।
नेहाल’! जब दिल के आइनों को साफ़ किया हमने,
वो जिसे खुदा समझा, हर धड़कन में बहता था।
Prof Nehaluddin Ahmad, LL.D. Professor of Law, Sultan Sharif Ali Islamic University (UNISSA), Brunei, email: ahmadnehal@yahoo.com



















