शहरनामा विशेष

क्या नेपाल में फिर उठ रही है हिंदू राष्ट्र और राजशाही की आवाज़?
“नेपाल में मैं हिंदू हूं।” यह छोटा-सा वाक्य आज नेपाल की राजनीति में केवल व्यक्तिगत धार्मिक पहचान का बयान नहीं रह गया है। इसके पीछे नेपाल की उस पुरानी पहचान की बहस भी दिखाई देती है, जिसमें एक तरफ देश को हिंदू राष्ट्र के रूप में देखने की मांग है और दूसरी तरफ मौजूदा धर्मनिरपेक्ष, संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य की व्यवस्था को बनाए रखने की आवाज़।

नेपाल कभी दुनिया का एकमात्र घोषित हिंदू राजतंत्र था। लेकिन राजनीतिक बदलावों के बाद 2006 में नेपाल को धर्मनिरपेक्ष घोषित किया गया और 2008 में राजशाही समाप्त कर गणराज्य की स्थापना हुई।
2015 के संविधान ने नेपाल को स्पष्ट रूप से “धर्मनिरपेक्ष, समावेशी, लोकतांत्रिक, समाजवादोन्मुख संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य” घोषित किया।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
81 प्रतिशत से ज्यादा हिंदू आबादी
नेपाल की 2021 की जनगणना के अनुसार देश की लगभग 81.2 प्रतिशत आबादी हिंदू है। इसके अलावा बौद्ध, मुस्लिम, किरात और ईसाई समुदाय भी नेपाल के सामाजिक ताने-बाने का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
यही कारण है कि नेपाल को फिर हिंदू राष्ट्र घोषित करने की मांग समय-समय पर राजनीतिक आंदोलनों में दिखाई देती रही है।
समर्थकों का तर्क है कि नेपाल की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को देखते हुए देश को हिंदू राष्ट्र का दर्जा मिलना चाहिए। कुछ संगठन इसके साथ संवैधानिक राजशाही की बहाली की मांग भी जोड़ते हैं।

राजशाही की वापसी की मांग भी साथ
2023 और 2025 में नेपाल की राजधानी काठमांडू सहित विभिन्न स्थानों पर राजशाही समर्थक प्रदर्शन हुए।
इन आंदोलनों में पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह की वापसी और नेपाल को दोबारा हिंदू राष्ट्र बनाने की मांग प्रमुख रही। 2025 में राजशाही समर्थक संगठनों ने संवैधानिक राजशाही तथा हिंदू राष्ट्र की मांग को एक साथ आगे बढ़ाया।
यानी आंदोलन का एक हिस्सा केवल धर्म की राजनीति नहीं है। उसके केंद्र में यह सवाल भी है कि क्या नेपाल को गणराज्य के बजाय फिर से राजशाही की ओर लौटना चाहिए?
‘मैं हिंदू हूं’ का राजनीतिक अर्थ
जब कोई बड़ा राजनीतिक नेता सार्वजनिक रूप से कहता है—“मैं हिंदू हूं”—तो यह अपने आप में नेपाल को हिंदू राष्ट्र बनाने की संवैधानिक मांग नहीं बन जाती।
लेकिन ऐसे बयान उस व्यापक बहस को जरूर मजबूत कर सकते हैं जिसमें नेपाल की राष्ट्रीय पहचान, धर्म और राज्य व्यवस्था के संबंध पर सवाल उठ रहे हैं।
नेपाल के संविधान में धर्मनिरपेक्षता का अर्थ केवल धर्म से दूरी नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता तथा ऐतिहासिक धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराओं की रक्षा भी है।
संविधान नागरिकों को अपने धर्म को मानने, उसका पालन करने और उसकी रक्षा करने का अधिकार देता है।
क्या नेपाल फिर हिंदू राष्ट्र बनेगा?
इसका जवाब फिलहाल आसान नहीं है।
हिंदू राष्ट्र की मांग को नेपाल में राजनीतिक समर्थन जरूर मिलता रहा है, लेकिन देश का वर्तमान संवैधानिक ढांचा धर्मनिरपेक्ष संघीय गणराज्य पर आधारित है। इसे बदलने के लिए संवैधानिक और राजनीतिक प्रक्रिया से गुजरना होगा।
इसके अलावा नेपाल केवल हिंदू समाज नहीं है। वहां बौद्ध, मुस्लिम, किरात, ईसाई और अन्य समुदाय भी रहते हैं।
इसलिए हिंदू राष्ट्र की बहस केवल बहुसंख्यक आबादी की धार्मिक पहचान का सवाल नहीं, बल्कि अल्पसंख्यक अधिकारों, समान नागरिकता और राष्ट्रीय पहचान का प्रश्न भी बन जाती है।
हाल के वर्षों में धार्मिक तनाव की घटनाओं ने इस बहस को और संवेदनशील बना दिया है। जुलाई 2026 में दक्षिण-पूर्वी नेपाल में हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच हिंसक झड़पों में मौतें और घायल होने की घटनाएं हुईं तथा कई इलाकों में कर्फ्यू लगाया गया।
नेपाल के सामने असली सवाल शायद यह नहीं है कि वहां कितने हिंदू हैं। संख्या तो स्पष्ट है—हिंदू बहुसंख्यक हैं।
सवाल यह है कि क्या धार्मिक बहुसंख्यकता को राज्य की संवैधानिक पहचान में बदला जाना चाहिए?
एक पक्ष इसे नेपाल की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान की वापसी मानता है। दूसरा पक्ष मानता है कि आधुनिक नेपाल की पहचान धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में ही सुरक्षित रह सकती है।
“नेपाल में मैं हिंदू हूं” से शुरू हुई पहचान की यह बहस इसलिए आने वाले दिनों में नेपाल की राजनीति का महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकती है—लेकिन हिंदू राष्ट्र की वापसी होगी या नहीं, इसका फैसला अंततः नेपाल की जनता, राजनीतिक दलों और संवैधानिक प्रक्रिया को करना होगा।
नेपाल की पहाड़ियों में उठती यह आवाज़ केवल धर्म की आवाज़ नहीं है—यह पहचान, इतिहास, राजशाही और लोकतंत्र के बीच चल रही एक बड़ी बहस की आवाज़ है।
















