शहरनामा विशेष
वाराणसी में रिश्तों का कड़वा सच: बड़े घरों की 125 महिलाएं आश्रम में रहने को मजबूर
अपनों ने सड़क पर छोड़ा, परिवारों ने पहचानने से किया इनकार; फिंगरप्रिंट और आइरिस स्कैन से सामने आई असली पहचान

वाराणसी।
धर्म और आस्था की नगरी वाराणसी से सामने आई एक तस्वीर समाज को आईना दिखाने वाली है। यहां एक आश्रम में ऐसी 125 महिलाएं रह रही हैं, जिन्हें उनके अपने परिवारों ने अपनाने से इनकार कर दिया। इनमें कई महिलाएं ऐसे परिवारों से हैं, जिन्हें कभी समाज में प्रतिष्ठित और संपन्न माना जाता था।
वाराणसी और आसपास के इलाकों में लावारिस हालत में मिली महिलाओं की पहचान कराने के लिए प्रशासन और संबंधित संस्थाओं ने फिंगरप्रिंट और आइरिस स्कैनिंग का सहारा लिया। इस प्रक्रिया के जरिए करीब 130 महिलाओं की पहचान सामने आई।
लेकिन पहचान सामने आने के बाद कहानी का सबसे दर्दनाक हिस्सा शुरू हुआ।
पहचान मिली, लेकिन परिवार नहीं मिले
जिन महिलाओं के नाम और पारिवारिक विवरण सामने आए, उनके परिजनों से संपर्क करने की कोशिश की गई। कई मामलों में परिवारों ने इन महिलाओं को वापस अपनाने से साफ इनकार कर दिया।
यानी जिन महिलाओं को कभी परिवार का हिस्सा माना जाता था, वही महिलाएं आज अपने ही घरों से दूर आश्रम की चारदीवारी में जीवन बिताने को मजबूर हैं।
इन 130 महिलाओं में से पांच की बीमारी के कारण मौत हो चुकी है, जबकि 125 महिलाएं ‘अपना घर आश्रम’ में रह रही हैं।
फिंगरप्रिंट और आंखों की पुतली बनी पहचान का सहारा
कई महिलाएं ऐसी स्थिति में मिलीं कि वह अपना नाम, पता या परिवार के बारे में स्पष्ट जानकारी देने की हालत में नहीं थीं। ऐसे मामलों में आधुनिक तकनीक मददगार बनी।
फिंगरप्रिंट और आइरिस स्कैन के जरिए पहचान की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई और उनके पुराने रिकॉर्ड से मिलान कर परिवारों तक पहुंचने की कोशिश की गई।
इस तकनीकी प्रक्रिया ने उन महिलाओं की पहचान तो उजागर कर दी, लेकिन एक बड़ा सवाल भी खड़ा कर दिया—क्या सिर्फ पहचान मिल जाना ही किसी इंसान को उसका घर वापस दिला सकता है?
बड़े घरों की बेटियां और मांएं भी बेघर
इस मामले का सबसे विचलित करने वाला पहलू यह है कि आश्रम में रहने वाली सभी महिलाएं गरीब या बेसहारा परिवारों से ही हों, ऐसा नहीं है। इनमें कई महिलाएं संपन्न और प्रतिष्ठित परिवारों की पृष्ठभूमि से जुड़ी बताई जा रही हैं।
कभी जिन घरों में उनके लिए नौकर-चाकर और सुविधाएं मौजूद थीं, आज उन्हीं महिलाओं के जीवन का सहारा एक आश्रम बन गया है।
समाज के सामने बड़ा सवाल
यह मामला केवल 125 महिलाओं की कहानी नहीं है। यह बदलते पारिवारिक रिश्तों और बुजुर्गों तथा बेसहारा महिलाओं के प्रति समाज के रवैये पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
आखिर वे कौन से हालात थे जिनमें परिवारों ने अपनी ही मां, बहन या रिश्तेदार को छोड़ दिया?
क्या बीमारी, मानसिक स्थिति, संपत्ति विवाद या पारिवारिक कलह इसके पीछे वजह बनी?
और सबसे बड़ा सवाल—अगर तकनीक फिंगरप्रिंट और आंखों की पुतली से किसी महिला की पहचान खोज सकती है, तो क्या हमारा समाज उसके लिए फिर से एक परिवार खोज पाएगा?
वाराणसी की ये 125 महिलाएं सिर्फ आश्रम में रहने वाली महिलाएं नहीं हैं। वे उन रिश्तों की जीवित कहानी हैं, जिनमें कभी ‘अपना’ शब्द सबसे बड़ा भरोसा हुआ करता था।















