इन सबके बावजूद भी गत कई दिनों से इस बात के कयास भी लगाए जा रहे थे कि मोदी, आडवाणी को गुरु दक्षिणा दे सकते हैं। बीच में मीडिया में ये खबरें भी आई थीं कि आडवाणी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बनाए जा सकते हैं। लेकिन ज्यों-ज्यों नामांकन की तारीख नजदीक आई, मुरली मनोहर जोशी का नाम चलने लगा, लेकिन संसदीय बोर्ड की बैठक में तमाम कयासों और चर्चाओं को विराम लगा दिया गया और पार्टी ने अपने दलित चेहरे पर दांव लगा दिया और बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद को एनडीए की तरफ से राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार तय कर सबको चौंका दिया दिया।
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दूर-दूर तक भी किसी के जहन में राम नाथ कोविंद के बारे में ख्याल नहीं था। उम्मीद लगाए दोनों वयोवृद्ध नेता नेताओं की आखिरी आस भी टूट गई है। हालांकि 2014 के चुनाव के बाद से ही नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद आडवाणी और जोशी का पार्टी में इतना महत्व नहीं रहा था। सिर्फ मार्गदर्शक मंडल तक सीमित हो गए थे। मगर यह कहां जा रहा था कि आडवाणी और जोशी में से कोई ना कोई राष्ट्रपति का उम्मीदवार बन सकता है? लेकिन ये आडवाणी का ख्वाब-ख्वाब ही रह गया हैं, और आडवाणी पीएम इन वेटिंग के बाद प्रेसिडेंट इन वेंटिग ही रह गए?
courtesy samachar jagat















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