—रिपोर्ट: शहरनामा मुंबई ब्यूरो
मुंबई का नाम आते ही ऊंची इमारतें, समुद्र और भागती-दौड़ती ज़िंदगी आंखों के सामने आ जाती है। लेकिन इसी महानगर के बीचोंबीच स्थित धारावी एक ऐसी बस्ती है जिसने अपनी मेहनत, छोटे उद्योगों और जज़्बे से पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है।
धारावी, मुंबई के माहिम क्षेत्र के पास लगभग 2.5 वर्ग किलोमीटर में फैला इलाका है। इसे कभी एशिया की सबसे बड़ी झुग्गी बस्तियों में गिना जाता रहा है। हालांकि केवल “झुग्गी” कहना इसकी पूरी पहचान नहीं है।
यहां हजारों छोटे-छोटे उद्योग चलते हैं जो करोड़ों रुपये का कारोबार करते हैं। चमड़े के सामान, मिट्टी के बर्तन, रेडीमेड कपड़े, प्लास्टिक रीसाइक्लिंग, खाद्य पदार्थ और हस्तशिल्प जैसे अनेक व्यवसाय यहां के लोगों की आजीविका का आधार हैं।
धारावी का इतिहास भी रोचक है। उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में यहां चमड़ा उद्योग शुरू हुआ। बाद में गुजरात के कुम्हार, उत्तर प्रदेश के कढ़ाई और परिधान कारीगर तथा देश के विभिन्न हिस्सों से आए मजदूर यहां बसते चले गए। धीरे-धीरे यह इलाका मेहनतकश लोगों का बड़ा केंद्र बन गया।

आज धारावी केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि उद्यमिता की मिसाल है। यहां हजारों परिवार अपने घरों से ही छोटे उद्योग संचालित करते हैं। यही कारण है कि सीमित संसाधनों के बावजूद धारावी मुंबई की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
हाल के वर्षों में धारावी के पुनर्विकास (रीडेवलपमेंट) की योजना तेजी से आगे बढ़ रही है। सरकार का उद्देश्य यहां के निवासियों को बेहतर आवास, सड़कें, स्वच्छ जल, आधुनिक सुविधाएं और सुव्यवस्थित शहरी ढांचा उपलब्ध कराना है। हालांकि पुनर्विकास को लेकर कुछ निवासी अपने रोजगार, सामाजिक ताने-बाने और विस्थापन को लेकर चिंताएं भी व्यक्त करते रहे हैं।
धारावी की सबसे बड़ी पहचान उसके लोग हैं। कठिन परिस्थितियों के बावजूद यहां के कारीगर, मजदूर और छोटे व्यापारी अपने श्रम और हुनर से रोज़ नए सपनों को आकार देते हैं। यही वजह है कि धारावी को केवल गरीबी की बस्ती नहीं, बल्कि मेहनत, आत्मनिर्भरता और जीवटता की मिसाल भी कहा जाता है।

चित्र कैप्शन: *मुंबई का धारावी—जहां संकरी गलियों के बीच छोटे उद्योग, कारीगरों की मेहनत और लाखों लोगों की उम्मीदें एक साथ सांस लेती हैं।*














