लखनऊ में रमज़ान के चाँद के साथ ही शहर की फ़िज़ा बदल जाती है। सुबह सहरी की ख़ामोशी और शाम इफ्तार की गहमागहमी—दोनों मिलकर अवध की तहज़ीब को नई रौशनी दे देते हैं। पुराने लखनऊ से लेकर नए इलाक़ों तक, मस्जिदें रोशनी से जगमगा उठती हैं और इबादत में लोगों की बड़ी तादाद शरीक होती है।
रमज़ान की रातों में बड़ा इमामबाड़ा, टीला वाली मस्जिद और ऐशबाग ईदगाह के आसपास विशेष रौनक़ देखने को मिलती है। तरावीह की नमाज़ के बाद देर रात तक लोग दुआओं और ज़िक्र में मशग़ूल रहते हैं।
इफ्तार के वक़्त अमीनाबाद और चौक जैसे इलाक़ों में रौनक़ अपने शबाब पर होती है। गलावटी कबाब, निहारी, हलीम, शीरख़ुरमा और रूह-अफ़ज़ा से सजी दुक़ानें रोज़ेदारों को अपनी ओर खींचती हैं। इफ्तार से पहले बाज़ारों में पैर रखने की जगह नहीं बचती।
रमज़ान के महीने में खैरात और मदद का जज़्बा भी खुलकर सामने आता है। जगह-जगह मुफ़्त इफ्तार का इंतज़ाम किया जाता है, जहाँ हर मज़हब और हर तबक़े के लोग एक साथ बैठकर रोज़ा खोलते हैं। समाजसेवी संस्थाएँ ज़रूरतमंदों तक राशन और दवाइयाँ पहुँचाने में जुटी रहती हैं।
ईद नज़दीक आते ही लखनऊ के बाज़ारों में ख़रीदारी तेज़ हो जाती है। कपड़े, इत्र, टोपी और सेवइयों की दुकानों पर देर रात तक भीड़ रहती है। कुल मिलाकर, लखनऊ में रमज़ान सिर्फ़ इबादत का महीना नहीं, बल्कि भाईचारे, सब्र और तहज़ीब का पैग़ाम लेकर आता है—जो इस शहर की पहचान को और मज़बूत करता है।#lucknow #ramzan #Ramadan




















