सीबीआई ने ही गुमराह किया कानून को. सीबीआई ने ही कहानी को हकीकत का नकाब पहना कर अदालत को उलझाया है. अब नौ साल चार महीने और 28 दिन बाद फिर से ढूंढो आरुषि और हेमराज के कातिल को. फिर बनाओ कोई नई कहानी. फिर लाओ कोई नई थ्योरी.
पिछले नौ साल चार महीने और 28 दिन से हर मां-बाप यही दुआ कर रहे थे कि जो वो सोच रहे हैं वो सच ना हो. नौ साल पांच महीने दस दिन से सीबीआई की पूरी कहानी जानने के बावजूद हर किसी को यही लग रहा था कि ये कहानी अधूरी है. झूठी है. चार साल पहले 25 नवंबर 2013 को सीबीआई की विशेष अदालत ने जब तलवार दंपत्ति को कातिल करार देते हुए उम्र कैद की सजा सुनाई थी तब भी उस फैसले पर बहस हुई. फैसले पर उंगली भी उठी. लगा फैसला अधूरा है. कहानी पूरी नहीं है. कड़ियां आपस में जुड़ नहीं रही हैं. वकील, दलील और कहानियां तो भरपूर हैं, मगर सबूत, चश्मदीद और थ्योरी गायब थी.














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