असगर अली – मोहम्मद अली इत्र वाले
अब सिर्फ़ यादों और इतिहास में महक
नवाबी शहर लखनऊ की पहचान सिर्फ़ अदब, नज़ाकत और तहज़ीब से ही नहीं, बल्कि यहाँ की खुशबुओं की सदियों पुरानी परंपरा से भी रही है। इसी परंपरा का एक अहम नाम रहे — असगर अली और मोहम्मद अली इत्र वाले, जिनकी बनाई खुशबुओं ने कभी लखनऊ ही नहीं, बल्कि दूर-दराज़ तक पहचान बनाई थी।
पुराने लखनऊ की गलियों में कभी जिन दुकानों और कारखानों से खस, गुलाब, केवड़ा, चंदन, मिट्टी और ऊद की खुशबू फैला करती थी, आज वहाँ सन्नाटा है। वक्त की मार, बदलता बाज़ार और मशीनों से बनी तेज़ खुशबुओं के दौर ने उस कुदरती इत्र कारोबार को धीरे-धीरे ख़ामोश कर दिया।

स्थानीय लोगों के मुताबिक,
एक समय था जब इन इत्रों की खुशबू दूर से ही पहचान ली जाती थी। लेकिन आज कारखाना बंद हो चुका है,
और असगर अली–मोहम्मद अली इत्र वाले का नाम
अब सिर्फ़ इतिहास और बुज़ुर्गों की यादों में रह गया है।
इन इत्रों की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि
खुशबू धीमी मगर देर तक ठहरने वाली होती थी,
केमिकल की जगह कुदरती अर्क इस्तेमाल होते थे,
और हर शीशी में लखनऊ की नफासत और खुशबू बसती थी।
आज जब तेज़ और नकली खुशबुओं ने बाज़ार पर कब्ज़ा जमा लिया है, तब असगर अली और मोहम्मद अली जैसे इत्र कारोबारी लखनऊ की खोती विरासत की मिसाल बन चुके हैं।
कहा जाए तो ग़लत न होगा कि
ये नाम अब किसी दुकान या कारखाने का नहीं,
बल्कि लखनऊ की तहज़ीब के इतिहास का एक बंद पन्ना हैं —
जिसकी खुशबू आज भी यादों में ज़िंदा है।
















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