लखनऊ।यह शहर अपने कबाब, तहज़ीब और नफ़ासत के लिए जितना मशहूर है, उतना ही अपनी अनकही गालियों के लिए भी। यहाँ गाली दी नहीं जाती, अदा की जाती है। आवाज़ में मिठास, चेहरे पर मुस्कान और शब्दों में ऐसा तंज़ कि सामने वाला तिलमिला भी जाए और जवाब देने से पहले सोच में पड़ जाए।

लखनऊ के गली-कूचों में अगर कभी झगड़ा हो भी जाए, तो वहाँ भद्दे शब्द नहीं उछलते। यहाँ तो बस इतना कहा जाता है— “हुज़ूर, ज़रा अक़्ल भी साथ रखते तो बेहतर होता।” और बात वहीं ख़त्म। न हाथ उठता है, न आवाज़ चढ़ती है, मगर संदेश सीधा दिल में उतर जाता है।
पुराने लखनऊ में बुज़ुर्ग कहते थे कि बदतमीज़ी करना भी बदतमीज़ी से किया जाए तो उसका असर ख़त्म हो जाता है। इसलिए यहाँ तमीज़ से झिड़कना सीखा गया। “अक़्ल के पैदल”, “दमाग़ गिरवी रख आए हैं क्या” जैसे जुमले सुनने में हल्के लगते हैं, मगर असर में भारी होते हैं।
शहर के चौक-चौराहों से लेकर बैठकख़ानों तक, बहस होती है तो लहजा कभी नहीं टूटता। सामने वाले को नीचा दिखाना हो तो गाली नहीं, जुमलेबाज़ी की जाती है। यही वजह है कि लखनऊ की गालियाँ भी किसी अदबी महफ़िल का हिस्सा लगती हैं।
आज जब देश के कई हिस्सों में भाषा की मर्यादा टूटती नज़र आती है, लखनऊ अब भी इस बात की मिसाल है कि नाराज़गी भी शाइस्तगी से जताई जा सकती है। यहाँ गाली सुनकर कान नहीं, ज़ेहन लाल होता है—और यही लखनऊ की असली पहचान है।



















