मुंबई में रमज़ान के आग़ाज़ के साथ ही शहर का मिज़ाज बदल जाता है। सहरी की ख़ामोशी से लेकर इफ्तार की रौनक़ तक, हर गली-कूचे में इबादत और इंसानियत का रंग गाढ़ा दिखता है। मस्जिदें रोशनी से नहाई रहती हैं और रोज़ेदारों की आवाजाही से इलाक़े आबाद नज़र आते हैं।
शाम ढलते ही इफ्तार की तैयारी ज़ोर पकड़ लेती है।
मोहम्मद अली रोड, भिंडी बाज़ार, कुर्ला और माहिम जैसे इलाक़ों में खाने-पीने के स्टॉल सज जाते हैं। हलीम, निहारी, कबाब, मालपुआ और शीरख़ुरमा की ख़ुशबू से पूरा इलाक़ा महक उठता है।
रमज़ान के दौरान इबादत के साथ-साथ खैरात और मदद का जज़्बा भी उभरकर सामने आता है। जगह-जगह मुफ़्त इफ्तार का एहतमाम किया जाता है, जिसमें हर मज़हब के लोग शामिल होकर भाईचारे की मिसाल पेश करते हैं। ज़कात और सदक़े के ज़रिये ज़रूरतमंदों तक मदद पहुँचाई जाती है।
शहर के प्रमुख धार्मिक स्थलों—हाजी अली दरगाह, जामा मस्जिद मुंबई और मीनारा मस्जिद—में देर रात तक रौनक़ रहती है। बाज़ारों में ईद की ख़रीदारी शुरू हो जाती है—कपड़े, इत्र, टोपी और सेवइयों की मांग बढ़ जाती है।
कुल मिलाकर, मुंबई में रमज़ान सिर्फ़ रोज़ों का महीना नहीं, बल्कि आपसी मोहब्बत, सब्र और साझी तहज़ीब का जश्न है—जो इस महानगर की रूह को और मज़बूत करता है।
शाहरनामा संवाददाता




















