यादव की आखिरी इच्छा के अनुसार, उनके परिवार ने बिना किसी आपत्ति के उनका अंतिम संस्कार आयोजित किया और मुस्लिम रिवाज़ के अनुसार उन्हें दफन कर दिया।
उनके बड़े बेटे अशोक यादव ने कहा, “मेरे पिता हमेशा दोनों धर्मों के लिए बहुत आदर करते थे और उन्होंने नियमित रूप से मंदिरों के अलावा ‘दरगाह’ का भी दौरा किया था।”
रमजान के पाक़ महीने के दौरान यादव हमेशा पास की मस्जिदों में इफ्तारी के वक़्त समोसे भिजवाया करते थे।
दफन पर उपस्थित व्यक्तियों में से एक ने कहा, “यह सांप्रदायिक सौहार्द का एक और उदाहरण है जिसके लिए यह शहर प्रसिद्ध है”।
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