जब भी मुंबई और लोकल ट्रेन का जिक्र होता है तब इसे हमेशा जिंदादिली से जोड़ा जाता है. लेकिन इस वाकये ने हमें सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या अपने काम की व्यवस्तता हमे तंग दिल बनाती जा रही है जिसमें इंसानियत की भी कोई जगह नहीं बची है.
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