By Professor Nehal Uddin Ahmad
नफ़रत के साये में मोहब्बत की तलाश
हम हमसफ़र न सही, साथ चल तो सकते हैं,
तेरी याद में अश्क़ों का सफ़र तो कर सकते हैं।
वफ़ाओं के साथ क़दम चाहे मिल न पाएँ,
काँटों भरी राह पे गुज़र तो कर सकते हैं।
दिल के दरवाज़े अगर बंद भी हो जाएँ,
हम दुआओं से दस्तक तो दे सकते हैं।
नफ़रत की आँधियाँ अगर उजाड़ें चमन,
हम रिश्तों के पुल फिर से बना तो सकते हैं।
सदियों की रफ़ाक़त सिसकियों में ढलते हैं,
इस तपिश के मौसम को भुला तो सकते हैं।
सफ़र-ए-ज़िंदगी में मंज़िल मिले या न मिले,
हम अपने सच को कारवाँ बना तो सकते हैं।
मस्जिद में रक़्स-ए-रूह कहाँ ढूँढ पाएँगे,
ये सज्दे सिर्फ़ रस्म ही निभा तो सकते हैं।
कफ़न बेच कर जब हों तिजारत के सौदे,
हम कलम से क़ब्रों को जुबाँ तो दे सकते हैं।
बाज़ार में जब हुस्न को ताबे बना दिया जाए,
हम क़लम से आँचल को फहरा तो सकते हैं।
जब सरे-आम औरत बे-आबरू की जाए,
हम सर शर्म से झुका, ज़ुबाँ खोल तो सकते हैं।
हिज्र की ये आग अब भला बुझती है कहाँ,
फिर भी गले मिलकर ग़म बाँट तो सकते हैं।
नेहाल, नफ़रत के इसअँधेरे में भी ऐ-दोस्त,
हम मोहब्बत की शम्अ जला तो सकते हैं।
प्रो. नेहाल
Prof Nehaluddin Ahmad, LL.D. Professor of Law, Sultan Sharif Ali Islamic University (UNISSA), Brunei, email: ahmadnehal@yahoo.com




















