By Professor Nehal Uddin Ahmad
नई तहज़ीब के आदाब नज़र नहीं आते,
तुझे तो ये उजड़े मकानात नज़र नहीं आते।
आईनों में तिरे जले हुए चेहरे नज़र नहीं आते,
लाशों के सजे ख़ूनी-बाज़ार नज़र नहीं आते।
ज़मीर के हिज़ाब अब कहीं भी नज़र नहीं आते,
अब दामन पे लहू के गहरे दाग़ नज़र नहीं आते।
हर रोज़ उजड़ती हैं बस्तियों की रगें-ओ-बू,
तुझे लहू के दाग़दार-उजाले नज़र नहीं आते।
जिस्म भूखे हैं, मगर हौसले अब भी ज़िंदा हैं,
क्या मक़तल में भी बेख़ौफ़ नज़र नहीं आते।
हर रोज़ सजती हैं ख़ामोश लाशों की कतारें,
अब क़ब्रों के ख़ाली मक़ाम नज़र नहीं आते।
लहू में भीगती जाती है ज़मीन की पेशानी,
तुझे क्यों उनके सज्दे-ए-फ़ना नज़र नहीं आते।
क़तरा-ए-आब तक रोक लिया ग़ज़ा के बच्चों से,
क्या उनके चेहरे शहीद-ए-सुरख़रू नज़र नहीं आते।
नेहाल’ पूछता है सिसकती ख़ामोशियों में,
तेरे क़ानून में ज़ालिमों के ज़ुल्म नज़र नहीं आते।
Prof Nehaluddin Ahmad, LL.D. Professor of Law, Sultan Sharif Ali Islamic University (UNISSA), Brunei, email: ahmadnehal@yahoo.com


















