ज़्यादातर निवेशकों का कहना है कि तुर्की की सरकार देश में कम होते उपभोग और निर्माण आधारित अर्थव्यवस्था में आई मंदी को नियंत्रित करने के लिए कोई क़दम उठाए. तुर्की का चालू खाता घाटा भी बढ़कर उसकी जीडीपी की पांच फ़ीसदी से ऊपर चला गया है.
डर है कि अर्थव्यवस्था में आई मंदी से महंगाई भी बढ़ेगी, जो अभी 15 फ़ीसदी से ऊपर है. ब्याज दर बढ़ाकर महंगाई और लीरा को दुरुस्त करने की बात की जा रही है. हाल के वर्षों में तुर्की की कंपनियों पर डॉलर और यूरो के क़र्ज़ बढ़े हैं.
केंद्रीय बैंक के आंकड़ों के अनुसार तुर्की की ग़ैर-वित्तीय कंपनियों की निर्भरता विदेशी मुद्रा पर बढ़ी है. इनके पास 200 अरब डॉलर से ज़्यादा विदेशी मुद्रा हैं. केवल अगले 12 महीनों में निजी ग़ैर-वित्तीय संस्थानों को 66 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा चुकानी है. तुर्की के बैंकों में यह आंकड़ा 76 अरब डॉलर है.
आधुनिक तुर्की के संस्थापक मुस्तफ़ा कमाल पाशा के बाद अर्दोआन को तुर्की का सबसे ताक़तवर शासक माना जाता है. अर्दोआन इस बात से सहमत नहीं हैं कि अर्थव्यवस्था को फिर से संतुलित करने की ज़रूरत है.



















