आईना देख हम चौंक जाते हैं,
अपना ही चेहरा पहचान में नहीं आता।
वक्त-पीरी में गुजर रही है शाम,
वक्त हमेशा तो मेहरबान नहीं होता।
उम्र-रफ़्ता में, अहद-ए-जवानी की बातें,
जैसे ठहरे पानी में, तेज़ लहरों की बातें।
गज़बऐ- इश्क जो जवानी में था,आज भी है,
वही आग पुरानी, मगर एहतियात में है।
तलातुम-आरज़ू जैसे पहले थी, वैसे आज भी है,
दरिया उतर गया है, मगर मौजें आज भी हैं।
बिजली अब भी कौंधती है, जिस्म के तहखाने में,
दिल मसोस के रह जाता है, इस आखिरी पैमाने में।
सुलगती है बेचैन ख़लिश, दिल में जंगली आग की तरह,
बेकाबू हुई जाती है, कल की वो खुशबू, नयाबे-इत्र की तरह।
जवानी के ख़्वाब आज भी निगाहों में बने रहते हैं,
मोहब्बत के वो अफ़साने अब दिल से बयां होते हैं।
हम अंदर से नरम, बाहर से सख्त बने रहते हैं,
अपने जज़्बात को अक्सर दूसरों से परे रखते हैं।
घरवाले भी हमारी तवज्जो से बेपरवाह रहते हैं,
क्योंकि हर ग़म, मुस्कान के परदे के पीछे छिपे रहते हैं।
अब भी दिलों में वही ख़्वाब, वही चाहत है,
कभी रो देना, कभी हंस देना, वही फ़ितरत है।
दिल और मन, जिस्म की क़ैद से बेपरवाह है,
ज़िंदगी का अज़ली वजूद, कहीं इन्हीं के बीच पिन्हां है।
रूह तो है ज़िन्दा जावेद , वहीं जिस्म है, आर्ज़ी ,
हर आहट पे हम तैयार है ,सफ़र की तैयारी की तरह ।
बुढ़ापे में दिल धड़कता है ,मासूम बच्चे की तरह,
जबकि जिस्म गुज़र चुका होता है बदलते मौसमों की तरह।
Prof Nehaluddin Ahmad, LL.D. Professor of Law, Sultan Sharif Ali Islamic University (UNISSA), Brunei, email: ahmadnehal@yahoo.com

















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