शहरनामा स्पेशल | रहमताबाद: मुंबई की शिया तारीख का खामोश सफ़ह़ा
मुंबई की पहचान सिर्फ गगनचुंबी इमारतों, समुद्र और भागती हुई जिंदगी से नहीं है। इस शहर की गलियों में ऐसी जगहें भी हैं, जहां सदियों की यादें खामोशी से सांस लेती हैं। मझगांव का रहमताबाद कब्रिस्तान ऐसी ही एक जगह है—मुंबई की शिया और ईरानी विरासत से जुड़ा हुआ एक ऐतिहासिक कब्रिस्तान।
रहमताबाद का उल्लेख मुंबई की विरासत सूची में “Rehmatabad Mugal Cemetery” के नाम से मिलता है और इसे Grade II-A विरासत स्थल के रूप में दर्ज किया गया है।
125 साल से ज्यादा पुरानी दास्तान
उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक रहमताबाद कब्रिस्तान दक्षिण मुंबई में रहने वाली ईरानी शिया आबादी के लिए 125 साल से भी ज्यादा पहले उपलब्ध कराया गया था। उस समय डोंगरी, मोहम्मद अली रोड और आसपास का इलाका शिया आबादी का एक महत्वपूर्ण केंद्र था।
समय के साथ यहां सिर्फ ईरानी समुदाय ही नहीं, बल्कि सैयद और हिंदुस्तानी शिया समुदाय के लोग भी दफ्न होने लगे।
यही वजह है कि रहमताबाद को केवल एक कब्रिस्तान कहना शायद इसकी पूरी कहानी नहीं बताता। यह मुंबई में शिया समुदाय के सामाजिक और धार्मिक इतिहास का भी एक हिस्सा है।
मुहर्रम और रहमताबाद का रिश्ता
मुंबई में मुहर्रम की परंपरा का इतिहास बहुत पुराना है। शोधकर्ताओं ने दर्ज किया है कि समय के साथ शहर में मुहर्रम के जुलूसों का रास्ता बदला और दक्षिण मुंबई का प्रमुख जुलूस रहमताबाद कब्रिस्तान की ओर जाने लगे
आशूरा के मौके पर डोंगरी, भिंडी बाजार और आसपास के इलाकों से निकलने वाले जुलूस रहमताबाद पहुंचते रहे हैं। 2016 की एक रिपोर्ट में भी आशूरा के जुलूसों के रहमताबाद पहुंचने और वहां शाम-ए-ग़रीबां की मजलिस का उल्लेख मिलता है।
यानी रहमताबाद सिर्फ मृतकों की आखिरी मंजिल नहीं—मुंबई की जीवित मज़हबी और सांस्कृतिक परंपरा का भी एक अहम पड़ाव है।
मीना कुमारी की कब्र
रहमताबाद को मुंबई के आम लोगों और फिल्मी इतिहास से जोड़ने वाला एक नाम है—Meena Kumari।
मशहूर अदाकारा मीना कुमारी का असली नाम महजबीं बानो था और 1972 में उनका निधन हुआ। उनकी कब्र रहमताबाद में है। मुंबई मिरर की एक रिपोर्ट ने उनकी कब्र को इस कब्रिस्तान की सबसे ज्यादा देखी जाने वाली कब्रों में बताया था।
एक तरफ मुंबई की फिल्मी दुनिया की चमक और दूसरी तरफ रहमताबाद की खामोशी—यह विरोधाभास भी इस जगह को खास बनाता है।
जगह कम होती गई
रहमताबाद की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक जगह की कमी रही है।
2016 की एक विस्तृत रिपोर्ट में बताया गया था कि कब्रिस्तान लगभग भर चुका था और सीमित जगह के कारण नई दफन की जगह उपलब्ध कराना मुश्किल होता जा रहा था। परिवारों की पुरानी कब्रों से भावनात्मक जुड़ाव और जमीन की कमी के बीच प्रबंधन को मुश्किल परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा था।
2008 में भी मुंबई के शिया समुदाय के लोगों ने नए कब्रिस्तान की मांग को लेकर आंदोलन किया था। उस समय रिपोर्टों में रहमताबाद को शहर के एकमात्र बड़े शिया कब्रिस्तान के रूप में वर्णित किया गया था।
मुंबई की मिली-जुली विरासत का हिस्सा
रहमताबाद जिस इलाके में है, उसके आसपास अलग-अलग समुदायों के ऐतिहासिक कब्रिस्तान और धार्मिक स्थल भी मौजूद हैं। मुंबई की विरासत सूची में उसी Dr. Mascarenhas Road क्षेत्र में Mazgaon Bene Israel Cemetery और Sir Adamji Peerbhoy Kabrasthan जैसे स्थल भी Grade II-A के अंतर्गत दर्ज हैं।
इस लिहाज से रहमताबाद सिर्फ शिया इतिहास की निशानी नहीं, बल्कि उस पुराने मुंबई की तस्वीर का हिस्सा है जिसमें अलग-अलग समुदायों की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत एक-दूसरे के करीब विकसित हुई।
आज का रहमताबाद
2026 की ताजा उपलब्ध रिपोर्टों में भी रहमताबाद में मुहर्रम के धार्मिक आयोजनों का उल्लेख मिलता है। हाल की रिपोर्ट के मुताबिक आशूरा के बाद रहमताबाद में शिया समुदाय ने “Evening of the Oppressed” के रूप में धार्मिक और मातमी कार्यक्रम किया।
इससे साफ है कि रहमताबाद केवल इतिहास की किताब का अध्याय नहीं है—यह आज भी मुंबई की शिया धार्मिक जिंदगी में सक्रिय भूमिका निभा रहा है।
शहरनामा की आखिरी लाइन
रहमताबाद की कब्रों के बीच सिर्फ इंसान दफ्न नहीं हैं—यहां मुंबई के एक दौर की यादें, ईरानी प्रवास की कहानी, शिया समुदाय की धार्मिक परंपराएं और शहर की बदलती सामाजिक तस्वीर भी दफ्न है।
मुंबई लगातार बदल रही है, लेकिन रहमताबाद की खामोश कब्रें आज भी उस मुंबई की कहानी सुनाती हैं, जिसे नई पीढ़ी शायद सिर्फ इतिहास के पन्नों में पढ़ती है।
शहरनामा स्पेशल — मझगांव, मुंबई।
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