लखनऊ। सब्ज़ियों और फलों की बढ़ती कीमतों ने एक बार फिर आम आदमी की रसोई का हिसाब बिगाड़ना शुरू कर दिया है। रोज़मर्रा की जरूरत की चीज़ों के दाम में उतार-चढ़ाव से घर का मासिक बजट प्रभावित हो रहा है।

सबसे ज्यादा नजर प्याज़ की कीमतों पर है। देश की प्रमुख प्याज़ मंडी लासलगांव में हाल के दो कारोबारी सत्रों में थोक भाव में करीब 16 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई है। इसकी वजह आपूर्ति में व्यवधान और मौसम की अनिश्चितता बताई जा रही है।
प्याज़ ने फिर बढ़ाई चिंता
प्याज़ की कीमतों में उतार-चढ़ाव को देखते हुए केंद्र सरकार ने उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए ₹35 प्रति किलो की दर से प्याज़ की बिक्री का दायरा 19 शहरों तक बढ़ाया है। भारी बारिश से फसल को हुए नुकसान को भी कीमतों में तेजी की एक वजह बताया गया है।
हालांकि सरकार का कहना है कि देश में प्याज़ का उत्पादन और बफर स्टॉक घरेलू मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त है।
लखनऊ में क्या हाल?
लखनऊ के उपलब्ध ताजा ऑनलाइन बाजार आंकड़ों में बड़े प्याज़ का खुदरा भाव लगभग ₹42–49 प्रति किलो, छोटे प्याज़ का ₹55–65, टमाटर ₹19–22, आलू ₹22–26 और हरी मिर्च करीब ₹57–68 प्रति किलो दिखाई दे रही है। बाजार और गुणवत्ता के अनुसार वास्तविक खुदरा कीमतों में अंतर हो सकता है।
फल भी दे रहे हैं झटका
सब्ज़ियों के साथ फलों की कीमतों में भी मौसम, आवक, परिवहन और मांग का असर दिखाई देता है। बारिश और आपूर्ति में व्यवधान का सीधा असर मंडी से लेकर फुटकर बाजार तक पहुंचता है और इसका अंतिम बोझ उपभोक्ता को उठाना पड़ता है।
सवाल सिर्फ महंगाई का नहीं…
सबसे बड़ा सवाल यह है कि किसान से लेकर उपभोक्ता तक पहुंचने के बीच कीमतों में कितना अंतर पैदा हो रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार मौसम की मार, सप्लाई चेन में व्यवधान, परिवहन लागत और बिचौलियों की भूमिका खाद्य कीमतों को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों में शामिल हैं।
ऐसे में जरूरत केवल कीमतों पर नजर रखने की नहीं, बल्कि किसान से उपभोक्ता तक पूरी सप्लाई चेन को पारदर्शी और मजबूत बनाने की है।
शहरनामा सवाल पूछता है—
सब्ज़ी महंगी होने का असली फायदा किसे मिल रहा है और इसकी कीमत आखिर आम आदमी ही क्यों चुकाए?

















