ज़िंदगी बूंद-बूंद मुख़्तसर होती जाएगी,
साँस के पर्दों में धीरे-धीरे सिमटती जाएगी।
वक़्त की धूप में हर चाहत पिघलती जाएगी,
ख़्वाब की लौ भी धीरे-धीरे बुझती जाएगी।
मौत के क़दमों की आहटें भी सुनती जाएगी,
फिर भी दुनिया से मोहब्बत करती जाएगी।
हम समझते थे कि रुक जाएगी ये बेचैनी,
पर ये बेचैनी तो उम्र के साथ बढ़ती जाएगी।
जो खो गया है वक़्त की आँधियों में कहीं,
उसकी कसक चुपचाप रग-रग में घुलती जाएगी।
नफ़रतों से जो सियासत रोज़ पलती जाएगी,
इंसानियत हर मोड़ पर ज़ख़्मी होती जाएगी।
मौत की आहट से डरकर भी क्या हासिल है,
ज़िंदगी हर हाल में अपनी शर्तों पे चलती जाएगी।
रास्ता जब भी अँधेरों से गुज़रता जाएगा,
रौशनी ख़ुद-ब-ख़ुद क़दम चूमती जाएगी।
वक़्त के साथ हर ख़ुशी धीमी पड़ती जाएगी,
फिर भी जीने की लौ और बढ़ती जाएगी।
नेहल, उम्र की धूप में हर साया ढलता जाएगा,
ज़िंदगी की किताब धीरे-धीरे बंद होती जाएगी।
Prof Nehaluddin Ahmad, LL.D. Professor of Law, Sultan Sharif Ali Islamic University (UNISSA), Brunei, email: ahmadnehal@yahoo.com
Prof. Nehaluddin Ahmad

















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