लखनऊ : (shiaqaum.com) लखनऊ जो भारत मे अज़ादरी का केंद्र रहा है। पूरे विश्व को अज़ादारी के विभिन्न आयामों से भी रूबरू कराने का श्रेय भी लखनऊ को ही जाता है। 8 महुर्रम को आज पूरे विश्व मे उठाया जाने वाला अलम ए फतेह फुरात की शुरूआत भी लखनऊ से ही हुई। दरिया वाली मस्जिद से ये जुलूस रात को एक मजलिस के बाद उठाया जाता है।
जो ऐतिहासिक इमामबाड़ा आसफी के सामने से होता हुआ इमामबाड़ा ग़ुफरानमाब पहुचता है। जुलूस मे अलम ए मुबारक की ज़ियारत के लिये दूर दूर से लोग सुबह से ही लखनऊ पहुचना शुरू कर देते हैं। अन्य धर्म के लोगों का मान्ना है की इस अलम की ज़ियारत से ही उनकी सभी मुरादें पूरी हो जाती हैं। जबकि शिया धर्म के लोग हज़रात अब्बास अलमदार की शहादत का पुरसा देते हैं गिरया ओ मातम बरपा करते हैं |

इस जुलूस का प्रबंधन अंजुमन रज़ाकारान ए हुसैनी के ज़िम्मे होता है जिसके वाॅलियंटर अलम ए मुबारक को साकुशल इमामबाड़ा ग़ुफरानमाब पहुचाते हैं। ये जुलूस देर रात इमामबाड़ा ग़ुफरानमाब पहुंच कर महिलाओं के सुपुरद किया जाता है जो कि हज़रत अब्बास के अलम को नहरे फुरात से इमाम हुसैन द्वारा लाया गया था और ख़ेमें मे अहल ए हरम को सुपुर्द किया था इस मंज़र का प्रतीक है। इस दिल सोज़ मंज़र को देख कर लोग बिलख उठते हैं। 8 महुर्रम को पुराने लखनऊ के हर गली कूचे मे हज़रत अब्बास अस की नज़र व नियाज़ का सिलसिला जारी रहता है।
अब्बास का परचम है अलम
दुनिया में जहां भी इमाम हुसैन के रौजे का प्रतीक ताजिया उठाया जाता है। वहां ताजिए के साथ अलम भी मौजूद रहता है। दरिया वाली मस्जिद से गुफरानमाब वाली मसजिद तक आठवीं मोहर्रम का अलम फतह-ए-फुरात का जुलूस निकाला। जुलूस में मौजूद अलम इमाम हुसैन की फौज के सिपहसालार हजरत अब्बास की याद में उटाया गया।
मस्जिद में हज़ारों की संख्या में काला लिबास पहने शिया समुदाय के लोग पहुंचे। वे अलम को छूने और उसे चूमने की कोशिश कर रहे थे। साथ ही मन्नत मांग रहे थे। इस दौरान हर कोई गमजदा था, मानो हजरत अब्बास की याद में उनकी आंखों से अश्कों का समन्दर उबल आया हो।
जुलूस से पहले मजलिस का आयोजन किया गया। इसमें बताया गया कि कैसे हजरत अब्बास को इमाम हुसैन ने अपनी छोटी सी फौज का सिपहसालार बनाया था।
वो कितने बहादुर और इमाम हुसैन से इजाजत लेकर कैसे कर्बला के मैदान में कुर्बानी देने आए थे। वे उस दरिया पर पानी लाने गये थे जिस पर यजीद की फौज का पहरा लगा था। जंग करते हुए वे दरिया तक पहुंचे और मश्क में पानी भरा। खैमों में वापस लौटते समय यजीदी फौज ने उन पर छिपकर हमला कर दिया।























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