आह ज़ेहरा सअ हम शर्मिंदा है ! कर्बला के बाद आज भी हम हुसैनी मैदान में सीना सिपर हैं | हम हुसैनी है इस लिये ज़ुल्म व बर्बरियत क़तई बर्दाश्त नहीं होती इसीलिये आज फिर हम ज़ुल्म के ख़िलाफ़ क़ौम व मिल्लत के ज़िम्मेदार लोगों को उनकी ड्यूटी याद दिलाना चाहते हैं |
लखनऊ में जहाँ हर तरफ़ मजलिस व मातम बरपा हैं | छोटे इमामबाड़े में 29 जमादिल अव्वल से 5 ज्मादुस्सानि तक देश विदेश से ज़ाकिर मजलिस पढ़ते हैं जगह – जगह ताबूत ए फ़ातिमा ज़ेहरा स अ बरामद होता हैं, अय्यामे फ़ात्मीया का सोग मनाने के लिये हम तारीखी इमामबाड़ों में जाकर मासूमीन अस को शहज़ादी ए फ़ातिमा ज़ेहरा स अ की शहादत का पुरसा देते हैं |
आइये अब हम आपको मौला अली अस के रौज़ा ए शाहनजफ़ लेकर चलते हैं | जहां 3 जमादुस्सानी की शबे शहादते फ़ातिमा ज़ेहरा सअ को पुरसा देने के बजाए लोग दावते वलीमा खाने में, शादी को इंजॉय करने में मसरूफ हैं |

ये शादी अगर मैरिज हाल या कहीं लॉन या घर में हो रही होती तो शायद दिल इतना ना दुखता जितना इस ग़म व आलम के मौके पर हम रंजीदा हैं | इमाम अली अस की ज़ौजा की शहादत का पुरसा रौज़ा ए शाहनजफ़ में हम इस अंदाज़ में दे रहे हैं | वाए हो हुसैनाबाद ट्रस्ट और इन तारीख़ी इमारतों के ठेकेदारों पर | जो इमामबाड़ों की हुरमत को पामाल कर रहे हैं |
पत्रकार के सवाल करने पर की शहादत के वक़्त में आपने शादी की बुकिंग कैसे ले ली तो हुसैनाबाद ट्रस्ट के ठेकेदार अहमद मेहदीं ने बड़ा खुबसूरत जवाब दिया कि दरअसल हिंदुस्तानी कलंडर नहीं था सो ग़म की तारीख़ पड़ गई |

लापरवाही इस दर्जे तक पहुंच जाएगी की हुसैनाबाद ट्रस्ट ग़म की तारीखों में इमामबाड़ों में मजलिस व मातम करवाना भूल जाता हैं | ये भूल आशूरा मोहर्रम में या और ग़म की तारीखों में भी दोहराई जा सकती हैं | शिया अवाम अपनी ज़िम्मेदारी निभाने में आगे आए और ज़्यादा से ज़्यादा हिंदुस्तानी क्लेंडर हुसैनाबाद ट्रस्ट के दफ़्तर तक पहुंचाए ताकि भविष्य में इतनी बड़ी ग़लती ना दोहराई जाए जिससे शिया अवाम मासूमीन के ग़म के बजाए क़ौम के ज़िम्मेदार लोगों की हरकतों से ग़मज़दा हों |















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