लखनऊ। राजधानी के ऐतिहासिक घंटाघर पर महिलाओं द्वारा लगातार विरोध प्रदर्शन जारी है। नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी के खिलाफ शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन करती महिलाओं के आज 54 दिन हो चुके हैं। प्रदर्शन कर महिलाएं कई ऐसे पड़ाव से गुजरी जब उनके सामने कोई फेस्टिवल या उत्सव आए तो घंटाघर पर बैठी सभी धर्म की महिलाओं ने एक साथ मिलकर मनाया।

इंसानियत की मिसाल कायम करते हुए फिर एक बार रंगो से भरा त्योहार होली जैसे उत्सव को भी साथ मिलकर मनाया। लखनऊ की गंगा जमुनी तहजीब को पेश करते हुए सभी महिलाओं ने एक दूसरे को गुलाल लगाकर होली खेली। एक दूसरे को मिठाईयां खिलाते हुए होली की मुबारकबाद दी। हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई आपस में सब भाई-भाई नारों के साथ इंसानियत का पैगाम दिया।
होली के मौके पर महिलाओं ने संदेश दिया कि साल में एक बार होली का त्योहार आता है। जहां हम सबको लड़ाया जाता है। सरकार से अपील करते हुए कहा कि हम सभी को आपस में मत लड़वाइए।

हम सब एक हैं हम सभी महिलाएं चाहते हैं देश में सुख शांति बनी रहे। जैसे देश में पहले अमन और शांति थी। उसी तरह से हम सब देश में सुख शांति देखना चाहते हैं। सरकार से चाहते हैं कि नागरिकता संशोधन जैसा काला कानून वापस ले। बेटी पढाओ बेटी बचावो पर अमल करते हुए महिलाओं को सम्मान दे और उसका अपमान न करें।
होली एक प्राचीन त्यौहार है
होली प्राचीन हिंदू त्यौहारों में से एक है और यह ईसा मसीह के जन्म के कई सदियों पहले से मनाया जा रहा है। होली का वर्णन जैमिनि के पूर्वमिमांसा सूत्र और कथक ग्रहय सूत्र में भी है।
प्राचीन भारत के मंदिरों की दीवारों पर भी होली की मूर्तियां बनी हैं। ऐसा ही 16वीं सदी का एक मंदिर विजयनगर की राजधानी हंपी में है। इस मंदिर में होली के कई दृश्य हैं जिसमें राजकुमार, राजकुमारी अपने दासों सहित एक दूसरे पर रंग लगा रहे हैं।
कई मध्ययुगीन चित्र, जैसे 16वीं सदी के अहमदनगर चित्र, मेवाड़ पेंटिंग, बूंदी के लघु चित्र, सब में अलग अलग तरह होली मनाते देखा जा सकता है।
होली के रंग
पहले होली के रंग टेसू या पलाश के फूलों से बनते थे और उन्हें गुलाल कहा जाता था। वो रंग त्वचा के लिए बहुत अच्छे होते थे क्योंकि उनमें कोई रसायन नहीं होता था। लेकिन समय के साथ रंगों की परिभाषा बदलती गई। आज के समय में लोग रंग के नाम पर कठोर रसायन का उपयोग करते हैं। इन खराब रंगों के चलते ही कई लोगों ने होली खेलना छोड़ दिया है। हमें इस पुराने त्यौहार को इसके सच्चे स्वरुप में ही मनाना चाहिए।
होली समारोह
होली एक दिन का त्यौहार नहीं है। कई राज्यों में यह तीन दिन तक मनाया जाता है।
दिन 1 – पूर्णिमा के दिन एक थाली में रंगों को सजाया जाता है और परिवार का सबसे बड़ा सदस्य बाकी सदस्यों पर रंग छिड़कता है।
दिन 2 – इसे पूनो भी कहते हैं। इस दिन होलिका के चित्र जलाते हैं और होलिका और प्रहलाद की याद में होली जलाई जाती है। अग्नि देवता के आशीर्वाद के लिए मांएं अपने बच्चों के साथ जलती हुई होली के पांच चक्कर लगाती हैं।
दिन 3 – इस दिन को ‘पर्व’ कहते हैं और यह होली उत्सव का अंतिम दिन होता है। इस दिन एक दूसरे पर रंग और पानी डाला जाता है। भगवान कृष्ण और राधा की मूर्तियों पर भी रंग डालकर उनकी पूजा की जाती है।


















