मुंबई। दक्षिण मुंबई के कोलाबा स्थित नेवी नगर की शांत सड़कों के बीच खड़ा अफगान चर्च, जिसे आधिकारिक तौर पर Church of St. John the Evangelist कहा जाता है, मुंबई की उन ऐतिहासिक इमारतों में शामिल है जहां वास्तुकला और इतिहास एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं।
AFGHAN CHURCH COLABA
आज यहां आने वाला व्यक्ति इसकी ऊंची मेहराबों, पत्थर के स्तंभों, रंगीन कांच की खिड़कियों और लकड़ी की खूबसूरत छत को देखकर कुछ देर ठहर जाता है। लेकिन इस खूबसूरत इमारत की कहानी सिर्फ धर्म और वास्तुकला की कहानी नहीं है—इसके पीछे 19वीं सदी के अफगान युद्धों की एक दर्दनाक सैन्य स्मृति भी दर्ज है।
1847 में रखी गई थी नींव
अफगान चर्च का निर्माण 1847 में शुरू हुआ। इसकी आधारशिला 4 दिसंबर 1847 को रखी गई थी और 1858 में चर्च को समर्पित किया गया। इसके बाद इसका प्रसिद्ध शिखर 1865 में पूरा हुआ।
चर्च को मुख्य रूप से पहले एंग्लो-अफगान युद्ध और 1842 में काबुल से ब्रिटिश सेना की विनाशकारी वापसी में मारे गए सैनिकों की स्मृति से जोड़ा जाता है। चर्च के भीतर मौजूद स्मारक पट्टिकाएं आज भी उस दौर की सैन्य त्रासदी को याद दिलाती हैं।
नाम अफगान चर्च क्यों पड़ा?
चर्च का मूल नाम St. John the Evangelist है, लेकिन अफगान युद्धों की स्मृति में बनाए जाने के कारण यह धीरे-धीरे Afghan Church के नाम से मशहूर हो गया। यह नाम आज मुंबई की ऐतिहासिक पहचान का हिस्सा बन चुका है।
Gothic Revival की शानदार मिसाल
अफगान चर्च की सबसे बड़ी खूबी इसकी वास्तुकला है। इसे Gothic Revival, विशेष रूप से Early English शैली से प्रभावित डिजाइन में बनाया गया। इसके डिजाइन से Henry Conybeare का नाम जुड़ा है। Conybeare मूल रूप से इंजीनियर थे और मुंबई के पानी की आपूर्ति व्यवस्था से भी उनका महत्वपूर्ण संबंध रहा।
चर्च के भीतर खड़े होकर ऊपर नजर जाए तो लकड़ी की लंबी, ढलानदार छत अपनी पूरी भव्यता के साथ दिखाई देती है। दोनों ओर ऊंचे पत्थर के स्तंभ और नुकीली Gothic मेहराबें पूरे भवन को एक गंभीर और गरिमापूर्ण रूप देती हैं।
आपकी भेजी तस्वीरों में यह वास्तुशिल्प खास तौर पर साफ दिखाई देता है।
रंगीन कांच की खिड़कियां—रोशनी में बदलती तस्वीर
अफगान चर्च की पहचान उसके stained-glass windows से भी है। रंगीन कांच से छनकर आती रोशनी चर्च के अंदर अलग ही वातावरण पैदा करती है। ऐतिहासिक स्रोत इन कांच के काम को William Wailes से जोड़ते हैं।
तस्वीरों में सामने दिखाई देने वाली तीन लंबी रंगीन खिड़कियां इस वास्तुकला की खूबसूरती को और उभारती हैं। नीले, लाल और हरे रंगों की रोशनी जब अंदर के पत्थरों और लकड़ी पर पड़ती है तो पूरा वातावरण किसी चित्र की तरह दिखाई देता है।
दीवारें सिर्फ दीवारें नहीं, इतिहास का दस्तावेज हैं
चर्च के अंदर लगी अनेक पट्टिकाएं और स्मारक उस दौर के सैनिकों और सैन्य अभियानों की याद को सुरक्षित रखे हुए हैं। यही वजह है कि अफगान चर्च को केवल धार्मिक इमारत के रूप में देखना इसके इतिहास को छोटा कर देना होगा। यह एक तरह से 19वीं सदी की औपनिवेशिक सैन्य स्मृति का स्थापत्य दस्तावेज भी है।
आपकी पहली तस्वीर में दिखाई दे रहे शिलालेख और स्मारक पट्ट इस बात को बहुत मजबूती से सामने रखते हैं।
मुंबई के इतिहास में एक अलग पहचान
मुंबई की पहचान सिर्फ गगनचुंबी इमारतों, समुद्र और आधुनिक जीवन से नहीं है। शहर के पुराने हिस्सों में ऐसी इमारतें भी हैं जो बीते दो सौ वर्षों के इतिहास को अपने भीतर समेटे हुए हैं।
अफगान चर्च उन्हीं इमारतों में से एक है।
यहां धर्म, वास्तुकला, औपनिवेशिक इतिहास, सैन्य स्मृति और कला—सब एक ही जगह दिखाई देते हैं।
शहरनामा की नजर से
इस बार जब शहरनामा की नजर अफगान चर्च के भीतर पहुंची तो कैमरे में सिर्फ एक पुरानी इमारत कैद नहीं हुई। तस्वीरों में वह मुंबई भी दिखाई दी जो अपनी आधुनिक रफ्तार के बीच अपने पुराने इतिहास को अब भी संभाले हुए है।
लकड़ी की छत के नीचे खड़े होकर ऊपर उठती Gothic मेहराबें, रंगीन कांच से छनती रोशनी, लोहे की बारीक नक्काशी और दीवारों पर दर्ज पुराने नाम—सब मिलकर जैसे एक ही बात कहते हैं:
मुंबई बदलती रही, लेकिन उसकी दीवारों ने इतिहास को संभालकर रखा।
और अफगान चर्च उन दीवारों में एक बेहद महत्वपूर्ण अध्याय है।
— शहरनामा स्पेशल
रिपोर्ट: शहरनामा मुंबई ब्यूरो
























