
ज़िंदगी यूँ ही गुज़र जाती है
ज़िंदगी जब तक थोड़ी सी समझ में आती है,
कम्बख़्त आधी से ज़्यादा यूँ ही गुज़र जाती है।
हर ख़ुशी पास से बस मुस्काकर निकल जाती है,
उसे पकड़ने की दौड़ में , ज़िंदगी फिसल ती जाती है।
ग़म की परछाइयाँ अक्सर दिल पे ठहर जाती हैं,
फिर रौशनी के लिए ज़िंदगी कितनी जद्दोज़हद कराती है।
सियासत की बिसातों पर बिछे हैं रिश्तों के मोहरे,
हर चाल इंसानियत को धीरे-धीरे मसल जाती है।
हम जिन्हें अपना समझते हैं जज़्बता में अक्सर,
वक़्त की धूप में वो छाँव-सी ढल जाती है।
तजुर्बा कहता है रिश्तों को क़रीब से देखो,
झूठ की परत परत अक्सर उधड़ जाती है।
ख़्वाब आँसुओं से धोकर जो सजा लेते हो,
सच की आंधी में वो तस्वीर बिखर जाती है।
तेरी आँखों की नमी अब भी दिल को छू जाती है,
ख़ुद से मिलने की हसरत, और शिद्दत से बढ़ जाती है।
तेरी यादें धूप के साथ दीवारों पे उतर आती हैं,
हर शाम ख़ामोशी से शबनम में भीग जाती है।
तेरे ख़्वाबों में उलझा हूँ अभी तक ‘नेहाल’,
नींद आती तो है मगर अधूरी रह जाती है।
Prof Nehaluddin Ahmad, LL.D. Professor of Law, Sultan Sharif Ali Islamic University (UNISSA), Brunei, email: ahmadnehal@yahoo.com















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