ईरान को लेकर लोगों को अपने कुछ भरम दूर कर लेने चाहिएं। एक, रिवोल्यूशनरी गार्ड्स या बसीज रेगुलर सेना नहीं है। बसीज की स्थिति कुछ-कुछ भारत की टेरिटोरियल आर्मी जैसी है। बस, भारत में टीए की सेवा स्वैच्छिक है जबकि ईरान में बसीजी अनिवार्य सैन्य सेवा देने वाले नागरिक हैं।
आईआरजीसी यानि रिवोल्यूशनरी गार्ड कार्प्स इलीट पैरामिलिट्री संगठन है। इसमें टाॅप लेवल पर अक्सर सैन्य, मिलिट्री इंटेलिजेंस और रक्षा एवं वैज्ञानिक सेवाओं से रिटायर या सेवानिवृत्त हो चुके लोग सलाहकार, ट्रेनर या प्रशासनिक रोल में सेवाएं देते हैं। दोनों ही संगठन सुप्रीम लीडर के दफ्तर के अधीन हैं। सरकार इनके मामलों में बहुत ज़्यादा दख़ल नहीं देती है। लड़ाई न हो तो बसीजी और आईआरजीसी के लोग स्कूलों में पढ़ाने से लेकर, खेती करने, मिसाइल बनाने, सैन्य ट्रेनिंग और परमाणु कार्यक्रम में सलाहकार जैसी भूमिकाओं में आ जाते हैं।
लेकिन पिछले बीस-पच्चीस वर्षों के दौरान सीरिया, यमन, लेबनान और इराक़ में आईआरजीसी ने ज़मीन पर रहकर शानदार लड़ाइयां लड़ी हैं। आईएसआईएस, अल-क़ायदा और उनके सहयोगियों से मोर्चा लिया है। हिज़बुल्लाह और अंसारुल्लाह जैसे मज़बूत सहयोगी खड़े किए हैं। और जिस मोर्चे पर लड़े हैं वहां मर गए, मगर मैदान छोड़कर भागे नहीं।
बहरहाल, हाल के वर्षों में जितने लोग अमेरिका और इज़रायल के निशाने पर रहे हैं उनमें अधिकांश सुप्रीम लीडर के दफ्तर या आईआरजीसी से जुड़े लोग हैं। हाल के इज़रायली हमलों में जो लोग निशाना बनाए गए वो भी इंक़लाब और रहबर के दफ्तर के लोग हैं। इसलिए, इस चिंता से बाहर निकल आइए कि इन लोगों के न होने से ईरानी सेना या परमाणु कार्यक्रम की सेहत पर कोई असर पड़ेगा। अब भी जो लड़ाई हो रही है उसमें सेना की सीमित भूमिका है। सैन्य कमांड और उसके संसाधन महफूज़ हैं।
मरहूम क़ासिम सुलेमानी से लेकर ब्रिगेडियर अमीर अली हाजीज़ादेह तक की उम्र देखिए। ज़्यादातर 60 प्लस के रिटायर्मेंट एज वाले अनुभवी लोग हैं। यक़ीनन, किसी आदमी का रिप्लेसमेंट नहीं है मगर बाक़ी दुनिया में इस उम्र के लोग घर बैठा दिए जाते हैं। ईरान में फौजी रिटायर होने के बाद भी शहादत खोजते हैं। बाक़ी अगर कभी बसीजियों और आईआरजीसी वालों की दिलेरी के बारे में जानने का दिल करे तो ईरान-इराक़ युद्ध के दौरान हुई ख़ुर्रमशहर और बसरा की ज॔ग पढ़ लीजिएगा। ये लोग इराक़ियों की बिछाई माइंस पर से या हुसैन कहते हुए गुज़र जाते थे और पीछे से रेगुलर सैनिक क़िलेबंदी करते हुए बढ़ते आते थे। हाल के वर्षों में भ्रष्टाचार, संसाधनों की कमी और लगातार लड़ाई की मार ने बसीजियों और आईआरजीसी को कमज़ोर किया है। कुछ ऐजेंटों के भी इसमें दाख़िल होने की ख़बर हैं।
लेकिन कुल मिलाकर इनके लड़ने के हौंसले में कमी नहीं आई है। इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि ये संगठन सेना से आगे बढ़कर लड़ रहे हैं, आपदा प्रबंधन कर यहे हैं और पिछले चार दिन में इन्होंने कई ग़द्दार भी धर दबोचे हैं।
बाक़ी ईरान ने फिल्हाल सीज़फायर के प्रस्ताव को फिर ठुकरा दिया है। ईरानी सेना ज़मीनी मिशन की तैयारी में जुटी है। सीरिया के लातकिया और इराक़ में मौजूद आईआरजीसी ज़रूरत पड़ने पर फिर से सीरिया और गोलान में दाख़िल होने के लिए तैयार हैं। मौजूदा लड़ाई दस दिन से ज़्यादा खिंची यो आईआरजीसी के लड़ाके एक बार फिर दमिश्क की तरफ कूच करते नज़र आएंगे। पीछे से ईरानी सेना लेबनान और इज़रायल तक जाकर लड़ने की तैयारी में जुटी है। जितना आसान लोगों ने इस जंग को समझ लिया है, ये उतनी है नहीं। लड़ाई अब या तो ईरान की शर्तों पर रुकेगी या तबाही की हद तक चलेगी।
मशहूर वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक ज़ैग़म मुर्तुज़ा की फेसबुक वाल से शुक्रिया के साथ
















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