By Professor Nehaluddin Ahmad
निगाहों में मंज़र ज़रा बदलने दो अभी,
दिल को इस ख़ुशी में सँभलने दो अभी।
मौसमों की तरह ख़ुशबू बिखरने दो अभी,
निगाहों में नर्म उजालों को उतरने दो अभी।
न मैं तुम से बात छेड़ूँ वो पुरानी कभी,
न तुम कुरेदो माज़ी की कहानी अभी।
हवा से हवा की मुलाक़ात होने दो ज़रा,
समंदर की लहरों पे छेड़ो तराने अभी।
थकी ज़िन्दगी को मिली फिर नई रौशनी,
इस लम्हे को जी भर के जीने दो अभी।
ग़म के बादलों को छँटने दो अभी,
आने वाले कल की फ़िक्र छोड़ो अभी।
क्यूँकि वो ही ज़र्रे से लेकर फ़लक तक है,
वहदत की सदा दिल में उतरने दो अभी।
नज़र से वो ओझल है, मगर दिल में मौजूद,
इस रूह को उसी के नूर में पिघलने दो अभी।
न मज़हब में क़ैद है, न सरहद का मोहताज,
हर दिल में “अनल-हक़” को बसने दो अभी।
नेहाल, ज़माने ने बहुत कुछ सिखाया मगर,
मजबूर हाथों में दिल को संभलने दो अभी।
Prof Nehaluddin Ahmad, LL.D. Professor of Law, Sultan Sharif Ali Islamic University (UNISSA), Brunei, email: ahmadnehal@yahoo.com



















