By : Prof . Nehaluddin Ahmad
बिना पूछे इश्क़ क्यों आ गया ज़िंदगी में,
फ़सले बहार बनके यूँ छा गया ज़िंदगी में।
जिस पे रखी थी दिल-ए-सब्र की बुनियाद,
ज़ख़्म पे ज़ख़्म मगर वो दे गया ज़िंदगी में।
इक ज़हर आहिस्ता घुलता गया ज़िंदगी में,
रंग-ए-इश्क़ आख़िर बे-रंग हो गया ज़िंदगी में।
क्या गिला उससे करें, क्या करें शिकायत,
जो मुक़द्दर था वही लिख गया ज़िंदगी में।
भूख ने सब्र की तस्वीर बदल डाली है,
आदमी सिक्कों पे बिकता रहा ज़िंदगी में।
क़ानून हाथ में तराज़ू लिए चुपचाप खड़ा,
इंसाफ़ बस इक तमाशा रह गया ज़िंदगी में।
अमीरों के लिए माफ़ी, ग़रीबों के लिए सज़ा,
ये कैसा मिज़ान है जो बिगड़ गया ज़िंदगी में।
नेहाल, किससे कहूँ कि मैं ज़िंदा हूँ अब भी,
दिल-ए-गुलशन आख़िर मुरझा गया ज़िंदगी में।
Prof Nehaluddin Ahmad, LL.D. Professor of Law, Sultan Sharif Ali Islamic University (UNISSA), Brunei, email: ahmadnehal@yahoo.com


















/odishatv/media/media_files/2026/04/19/billionaire-entrepreneur-2026-04-19-23-55-02.jpg)


