‘आजादी का अमृत महोत्सव’ प्रगतिशील भारत की आजादी के 75 साल और इसके लोगों, संस्कृति और उपलब्धियों के गौरवशाली इतिहास को जनमानस के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए भारत सरकार की एक अनूठी एवं दूरगामी पहल है।
आजादी का अमृत महोत्सव भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक पहचान के बारे वैश्विक पटल पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों , व्याख्यानों के माध्यम से जनमानस को जागरूक करता है ।
“आज़ादी का अमृत महोत्सव” की आधिकारिक यात्रा 12 मार्च, 2021 को प्रारम्भ होती है, जो हमारी स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ के लिए 75 सप्ताह की उलटी गिनती शुरू करती है और 15 अगस्त, 2023 को एक वर्ष के बाद पूर्ण होगी।
अमृत महोत्सव कार्यक्रमों की श्रृंखला में दिनांक 28 मई 2022को विनायक दामोदर सावरकर जयंती के अवसर पर महाराजा बिजली पाँसी राजकीय महाविद्यालय लखनऊ द्वारा ‘क्रांतिकारी आंदोलन के विकास में वीर सावरकर का योगदान’ विषय पर एक वेबिनार का आयोजन किया गया, जिसमें मुख्य वक्ता के रूप में महाविद्यालय के छात्रों, शिक्षकों एवं कर्मचारियों को सम्बोधित करते हुए महाविद्यालय के इतिहास विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ० सनोबर हैदर ने सावरकर को आजा़दी का महानायक सिद्ध करते हुए भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में उनके अतुलनीय योगदान को रेखांकित किया एवं सावरकर के सम्बन्ध में इतिहास से जुड़े ऐसे पहलुओं एवं तथ्यों की युक्तियुक्त जानकारी उपलब्ध कराइए जिससे अधिकाँश श्रोता अनभिज्ञ थे जिन्होंने न केवल व्याख्यान को सराहा वरन व्याख्यान के दैरान प्रश्न पूछ कर अपनी जिज्ञासाओं को शांत किया।
सावरकर का जन्म देश के प्रबुद्ध चितपावन ब्राह्मण परिवार में 28 मई 1883 को भागहुर (पुणे , महाराष्ट्र) में हुआ था। विद्यालय में प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने सावरकर ने फर्ग्युसन कॉलेज पुणे, महाराष्ट्र से स्नातक की उपाधि लेने के उपरान्त उन्होंने लन्दन से विधि की शिक्षा लेने गए थे , जहां पर उनके क्रांतिकारी स्वभाव में आमूलचूक परिवर्तन आया जिसका श्रेय प्रबुद्ध क्रांतिकारी नेता श्यामजी कृष्णजी वर्मा को भी जाता है , जिनकी संगति में सावरकर की क्रांतिकारी विचारधारा का उन्नयन हुआ।
लन्दन में रह कर सावरकर ने फ्री इंडिया सोसायटी नामक संस्था की स्थापना करी और १८५७ की क्रान्ति के 50वीं वर्षगांठ के उपरान्त अपनी पुस्तक “इंडियन वॉर ऑफ़ इंडिपेंडेंस” 1909 में प्रकाशित की थी जिसको सरकार द्वारा भारत एवं इंग्लैंड में प्रतिबंधित कर दिया गया था। सर विलियम कर्ज़ों वाइली की क्रांतिकारी मदनलाल ढींगरा के द्वारा ह्त्या किये जाने के उपरान्त सावरकर पर ब्रिटिश सरकार ने अपनी कुदृष्टि बना ली थी एवं उनकी गिरफ्तारी का वारंट जारी कर दिया था। सावरकर एक कुशल राजनीतिज्ञ, कवि, लेखक और नाटककार भी थे।
सावरकर के राजनीतिक दर्शन में उपयोगितावाद, तर्कवाद, प्रत्यक्षवाद , मानवतावाद, सार्वभौमिकता, व्यावहारिकता और यथार्थवाद के तत्व प्रमुखता से विद्यमान थे।
सावरकर भारत के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य के केन्द्र लन्दन में ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध क्रांतिकारी आन्दोलन संगठित किया।
सावरकर भारत के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने सन् 1905 के बंगाल विभाजन के उपरान्त सन् 1906 में ‘स्वदेशी’ का नारा दिया और विदेशी कपड़ों की होली जलाई।
सावरकर भारत के पहले व्यक्ति थे जिन्हें अपने क्रांतिकारी एवं राष्ट्रवादी विचारों के कारण बैरिस्टर की डिग्री खोनी पड़ी।
सावरकर उन पहले भारतीयों में से एक थे जिन्होंने ‘पूर्ण स्वतन्त्रता’ की मांग की।
सावरकर भारत के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने सन् 1857 की लड़ाई को ‘भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम’ बताते हुए 1907 में लगभग एक हज़ार पृष्ठों का इतिहास लिखा।
सावरकर भारत के पहले और दुनिया के एकमात्र लेखक थे जिनकी पुस्तक को प्रकाशित होने के पहले ही ब्रिटिश साम्राज्य की सरकारों ने प्रतिबन्धित कर दिया था।
सावरकर दुनिया के पहले राजनीतिक कैदी थे जिनका मामला हेग के अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय में चला था।सावरकर पहले भारतीय राजनीतिक कैदी थे जिसने एक अछूत को मन्दिर का पुजारी बनाया था।
उक्त कार्यक्रम का संयोजन व संचालन महाविद्यालय के सहायक प्रोफ़ेसर (हिंदी विभाग) डॉ०राघवेन्द्र मिश्र ने किया।


















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