मुजफ्फरनगर. मुजफ्फरनगर दंगों को दो साल हो चुके हैं, लेकिन तबाही के निशान अब भी वैसे ही हैं। बस्तियां खाली हैं। मकान सूने हैं। जख्म हरे हैं। और दिलों में विश्वास की कमी बनी हुई है। जो जान बचाकर गांव छोड़ भागे थे वह अभी तक अपनी जमीन पर दोबारा आने की हिम्मत नहीं जुटा पाए हैं। सहमे हुए लोग अब भी शरणार्थी शिवरों तक सीमित हैं। हालांकि, कुछ लोगों ने इन्हें वापस ले जाने की भी कोशिश की, लेकिन खौफ के उन मंजर को याद कर कदम नहीं उठा पाए।
50 हजार लोग हुए थे बेघर
दो साल पहले एक पाकिस्तानी वीडियो, जिसे कवाल में भीड़ द्वारा हुई दो युवकों की हत्या कहकर प्रचारित किया गया। सात सितंबर 2013 को मुजफ्फरनगर और शामली में दंगे भड़क उठे। इनमें 60 से ज्यादा लोगों की जान गई और 50 हजार से अधिक लोग बेघर हो गए। हालांकि उत्तर प्रदेश सरकार ने दंगा पीड़ितों को मुआवजा तो दिया, लेकिन सरकार ने दंगा पीड़ितों के घर वापसी के लिए कोई प्रयास नहीं किया। दो साल बीत जाने के बाद भी ये लोग अभी भी वापस अपने गांव जाने से डरते हैं। आज भी ये लोग उस काली रात का खौफनाक मंजर नहीं भूले हैं।
अपनों ने ही दिया दगा
मुजफ्फरनगर और शामली के अलग-अलग हिस्सों में रह रहे हजारों दंगा पीड़ितों के जख्म आज भी ताजा हैं। अपने परिवार के तीन लोगों को गंवा चुकी लिसाढ़ गांव की सकुरान कहती हैं, ‘मुझे मरना पसंद है, लेकिन किसी भी कीमत पर अपने गांव वापस जाना मंजूर नहीं।’ दंगाग्रस्त गांव फुगाना के दंगा पीड़ित फिरोज का कहना है, ‘गांव वापस जाने का मन नहीं करता। अपने लोगों ने ही दगा दिया। फिरोज के पास बैठ एक बुजुर्ग ने कहा, ‘दंगे के बाद घर जमीन सब कुछ खो गया। यहां तक कि दंगों के बाद गांव के लोगों ने ही हमारे घरों के दरवाजे खिड़कियां और ईंट तक उखाड़ ले गए तो कैसे विश्वास बन पाएगा।’
वापस लाने का प्रयास
लिसाढ़ गांव के गठवाला खाप के प्रतिनिधि विकास मलिक का कहना है, ‘गांव के तमाम मुस्लिम जो दंगो में चले गए थे, उन्हें वापस गांव में लाने का प्रयास किया जा रहा है। कुछ लौटना भी चाहते हैं तो दूसरे उन्हें रोक देते हैं। हम उन्हें विश्वास दिला रहे हैं वो पूरी तरह सुरक्षित रहेंगे। सब पहले की तरह मिलजुल कर रहेंगे।’
कहां भड़की थी हिंसा
सात सितंबर 2013 काे शाहपुर क्षेत्र के नंगला मंदौड महापंचायत में शामिल होने जा रहे हजारों लोगों पर गांव बसीकंला में हमला हो गया था। इससे कस्बे में भी अफरा-तफरी का माहौल बन गया था, जिसके बाद दोनों पक्षों की सांप्रदायिक हिंसा में गांव बसीकला, पलडी, खतौला सहित कस्बे के काफी लोग घायल हो गये थे। बाद में पंचायत में पहुंचकर गांव के लोगों ने अपने ऊपर हमला होने की जानकारी दी, तो पंचायत में रोष व्याप्त हो गया था। साथ ही बसी गांव को घेरने का फरमान जारी कर दिया गया था। पंचायत से लौटते समय गांव पुरबालियान में लोगों पर हमला हुआ था, जिसमें गांव काकडा के राजबीर, विकास, महेंद्र और गांव सोरम के विपिन की इलाज के दौरान मौत हो गई थी और दर्जनों लोग घायल हो गये थे। इसके बाद गांव कुटबा और काकडा सहित कई गांवों में सांप्रदायिक हिंसा हो गई थी, जिसमें आठ लोगों की मौत हो गई थी। इससे आसपास के अन्य जिलों में भी सांप्रदायिक हिंसा फैल गई थी।















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