
महमूद आब्दी
महमूद आब्दी
गेट से दाखिल होते ही ऐसा लगता था जैसे किसी कला अकादमी या किसी अरिस्ट के स्टूडियो में आ गए हो। उस घर के रखरखाव से बिलकुल न लगता न था के वो किसी डॉक्टर का घर या मतब (क्लिनिक) है।
डॉक्टरों के मतब से अक्सर अस्पताल जैसी बू आती है जो उनके घर तक पहुच जाती है जहां वह अपने घर का एक कमरा भूले बिसरे मरीज़ों के लिए गेस्ट रूम की तरह रख छोड़ते हों। के क्या पता कोई रात बिरात उनकी कुंजी खटखटा दे। मुसीबत और मरीज़ किसी वक़्त भी आ सकते है।

मै अक्सर सोचता हूँ के आखिर ये डॉक्टर अस्पताल वाली इस बू को छुपाने के लिए कोई उपाय क्यों नहीं करते। मेरा ज़ाती तजरूबा है के सौ मे इक्का दुक्का ही डॉक्टर कभी कोई सेंट या परफ्यूम लगाते होंगे। परफ्यूम बनाना शुरू नहीं किया जिसके सैंपल इन्हें मुफ़्त मिल जाया करते। इसीलिए कंम्भख्त किसी क़दर खूबसूरत ही क्यों न हो हम कभी किसी डॉक्टरनी तक को हग करने में कोई दिलचस्पी नहीं रखते। अव्वल तो ये लोग गले इस एहत्यात से मिलते है जैसे पोस्टमॉर्टम से पहले किसी लाश का हलके से मुआयना कर रहे हो। और फिर वही अस्पताल वाली बू कोई खामखाँ क्यों सूँघे।
एक बात और डॉक्टरों की क्लिनिक में या तो दवा की कंपनी के कैलेंडर लगे होते है जिनपर हस्ते खेलते बच्चे तो ठीक लगते है मगर वो मुह फैलाये रेबीज़ की दवा वाले पोस्टर के भयानक कुत्ते को देखने के बाद गली का बेचारा बेज़र्र कुत्ता भी आतंकवादी नज़र आता है। कुछ न सही तो कमसे कम एक आद फॅमिली प्लानिंग का पोस्टर तो मस्ट है हर क्लिनिक के लिए।
लेकिन हमारे डॉक्टर नारायण का जिनका के घर ही मत और मतब ही घर था वहा इस किस्म के कोई आसार न थे। दीवारों पर कही म्यूरल तो कही पैंटिंग या छोटे बड़े फ्रेम्स में बेतरतीबी से टँगी हुई तस्वीरें माहौल में एक लै पैदा करती थी। खाली दीवार पर एक काली स्लेट लटकी थी जिसर लिखा था आज स्कूल बंद है। चौकोंर बरामदे में चारो तरफ रौट आयरन की पुरानी बेंचेस रखी होती थी जिनके बीच एक आराम कुर्सी हुआ करती थी जिपर बैठकर डॉटर नारायण कभी झूल कर तो कभी झूमकर मरीजों से इनेर्ट्सक्ट किया करते थे। मरीजों से ख़ास मुलाक़ात के लिए तो उनके लॉन में कोठरी नुमा एक कमरा था। जिसमे अक्सर मरीज़ जाते तो कभी हाइपर तो कभी डिप्रेसड मगर बाहर सभी निकलते एक ही तरह कुछ खोये खोये अधजगे से अपने साथ आये अटेंडेंट का सहारा लिए हुए। गोया हाइपर हो या डेप्रीसेड डॉक्टर साहब सबको एक ही नज़र से देखते थे। सुना है उस कोठरी नुमा कमरे में हालचाल पूछने के बाद वो मरीज़ को कोई इंजेक्शन लगा देते थे जिससे उसका दिमाग सुन हो जाता था।
हमारे डॉक्टर नारायण शहर के मशहूर psychiatrist थे। शहर के नामवर लोग अक्सर इनके पास ढके छुपे अपने मरीजों को दिखाने लाते थे। दिमाग़ के डॉक्टर जिनको आम बोलचाल में पागलों का डॉक्टर कहा जाता है के पास किसी का भी खुलेआम आना बड़े सवाल पैदा कर सकता था इसलिए अगर कोई इनकी लोग क्लिनिक में आता जाता दिख जाता तो वो बस यहाँ आने की स्टैण्डर्ड सी वजह depression बता देते था।
एक psychiatrist अपने मरीजों की ज़िन्दगी का वैसे ही राज़दार होता है जैसे किसी ज़माने में महाजन हुआ करते थे। कौन सी चीज़ किस ज़ुरूरत के तहत इनके पास कब गिरवीं रखी गई और इनसे कितने रुपए क़र्ज़ लिए गए ये बात इनके सीने और खातों में ही महफूज़ दबी रहती थी।
अपनी बेटी की किसी ज़ेहनी तकलीफ के इलाज के लिए एक दिन इनके पास हाई कोर्ट के एक जज साहब आ गए। लाल बत्ती वाली सरकारी गाड़ी और साथ में हटो बचो करता हुआ उनका अमला इस उम्मीद से आया था के जज साहब के आने की खबर सुनते ही डॉक्टर नारायण उन्हें गेट पर रिसीव करने आयेगे और सब मरीजों को छोड़कर जज साहब की बेटी को पहले देख लेंगे। मगर ये आम दवाखाना कहाँ था यहाँ तो बिगड़े हुए दिमाग़ ठीक किये जाते थे। लिहाज़ा डॉक्टर साहब ने जज साहब से कह दिया आप तो हाई कोर्ट जज है और आपको को तो बेंच में बैठने की आदत होगी लिहाज़ा और मरीजों के साथ बरामदे की बेंच पर तशरीफ़ रखे और अपनी बारी का इंतज़ार करे।
बरामदे और लिविंग रूम के बीच एक छोटी से गैलरी थी जो भी तरह तरह के अर्टिफस्स्ट्ज़ सामान से भरी पड़ी थी। किस्म किस्म की मूर्तिया, तिब्बत, भूटान और लद्दाक से लाये हुए बुद्धिस्ट आइटम्स जहाँ तहाँ रखे थे। एक दीवार पर लकड़ी की एक छोटी सी क्रॉस और एक रोज़री टँगी रहती थी जिसके बारे में ये बताते थे को वो इन्हें इनकी तक़रीर से सुनकर मदर टेरेसा इतनी खुश हुई के उन्होंने वो क्रॉस और रोज़री अपने गले से उतार कर इन्हें पहना दी थी।
वैसे डॉक्टर नारायण थे कमाल के स्पीकर। क्या हिंदी, क्या उर्दू और क्या अंग्रेजी तीनो ज़बानों पर महारत। हिंदी के कवि थे मगर लिखते उर्दू में थे। ऊंची आवाज़ में ऐसी क़ुइन्स इंग्लिश बोलते थे जैसे पंडित नेहरू Tyrist with Destiny सुना रहे हों। वैसे इन्होंने बंगाली और पंजाबी के कुछ सेंटेन्सेज़ भी याद कर लिए थे जिन्हें ये वक़्त बवक़्त खूबसूरत औरतों के साथ ice break करने के काम में लाया करते थे।
इसी गैलरी की एक दीवार पर दो robes टंगे थे। एक क्रिस्चियन प्रीस्ट का रोब जो इन्होंने मंगलोर की किसी सिमिनरी से खरीदा था। बताते थे इसको पहनकर वो उस दिन पूरी सिमिनरी में हर आते जाते को God bless my child कहते हुए घूमते रहे। सभी इनसे ब्लेस्सिंग्स ले रहे थे। यहाँ तक के सेमिनरी का हेड प्रीस्ट भी इनके रुआब में आ गया और घबराकर इनके हाथ चूम लिए।
दूसरा रोब बुद्धिस्ट लामा का था जो ये लद्दाक से खरीदकर लाये थे। इस लिबास में इनकी एक तस्वीर Monesrty के बेबी Lamas के साथ फुटबॉल खेलते हुई भी थी। लामा का ये रोब पहनकर कई दिनों तक शहर में घूमते रहे थे।
इनको तरह तरह के कपडे पहनने का शौक़ था। बम्बई आये तो कोलाबा में घूम रहे अरबो का ड्रेस पसंद आ गया। बोले होना तो ऐसा ही चिहिए मगर कुछ chatkhila और colourful. दुकानदार ने लेडीज मैक्सि थामा दीं। जबतक इनका दिल न भर गया sleeveless मैक्सी पैहनकर ये मरीज़ देखते रहे।
इसी तरह एक बार ये काठमांडू गए तो वहा से एक दर्जन भर बड़ी बड़ी चढ़ियां खरीद लाये जिनपर लाल लाल छोटे छोटे हार्ट और फूल बने थे। बाद में पता चला के वो तो लेडीज panties थी इन्होंने फ़ौरन गिफ्ट पैक करवा के उन्हें अपनी mother इन लॉ को गिफ्ट कर दिया
इनका लिविंग रूम किताबों से भरा था। आर्ट, लिटरेचर, फिलोसोफी, और रिलिजन पर सैकड़ो किताबे तरह तरह के बुक शलवेज़ और छोटी बड़ी मेजों पर रखी होती थी। मगर यहाँ भी बेतरतीबी एक किताब के साथ एक छोटी सी किताब। जैसे महाबली खली के साथ लिलिपुट सेल्फी ले रहा हो। हाँ रेलिजयस स्क्रिप्टुरेस सब एक जगह रखते थे। मगर इनको भी ये बड़ी पाबन्दी से ऊपर नीचे कर दिया करते थे। कभी क़ुरआन के ऊपर गीता तो कभी गीता के ऊपर बाइबिल और ग्रथ साहब। ये सिलसिला रोज़ बदलता रहता था। कहते थे वो ऐसा इसलिए करते थे के देखने वालों से ज़्यादा ये बात उनको याद रहे के इनमे से कोई भी न किसी से अच्छा है न बुरा। इस लिए किसी को भी किसी के ऊपर रख दो क्या फ़र्क़ पड़ता है।
इसी कमरे के एक कोने में रखी ऊंची कार्नर रैक के सबसे ऊपर वाले शल्व पर एक हंडिया रखी रहती थी जो अपने ऊपर एक गोल्फ कैप पहने हुए थी। ग़ौर से देखिये तो तो गोल्फ कैप के नीचे एक पुराने लाल कपडे के कुछ सिरे नज़र आते थे। जितनी पुरानी हंडिया उतना ही पुराना ये लाल कपडा। इस हंडिया के सामने डॉक्टर साहब ख़ासा वक़्त गुज़ारते थे। कभी कही सफ़र पर जाते तो इस हंडिया से बाय बाय केहकर ही निकलते। फिर जब लौटते तो सबसे पहले उस गोल्फ कैप को प्यार करते। फुरसत के वक़्त डॉक्टर नारायण गोल्फ कैप वाली इस हंडिया से चपके चुपके बाते भी करते थे।
कुलमिलाकर डॉक्टर नारायण घर में कही भी हो हर घंटे पौन घंटे पर इस हंगिया के पास आकर उसपर रखी टोपी को हल्का हल्का एडजस्ट करते रहते थे। के एक दिन मै इनके घर बहुत सुबह पहुच गया तो क्या देखा के ये अपने कमरे से निकले और हंडिया की तरफ बढ़ते हए ज़ोर से गुड मॉर्निंग पापा कहते हुए हंडिया पर रखी हुई गोल्फ कैप को किसी के सर की तरह किस करने लगे। वो धीरे धीरे और क्या बातें कर रहे थे मै समझ न पाया।
पता चला के उस गोल्फ कैप वाली हंडिया में उनके father की अस्थियां थी जो वहां पिछले सतरह साल से इसी तरह रखी थी। इनके father अपने वक़्त के एक नामी वकील थे जिन्होंने काफी ripe age में इस दुनिया को बाय बाय कहा था। मगर डॉक्टर नारायण उनकी जुदाई को कभी accept न कर सके। चिता पर लेटे हुए बाप के पैरों को जब इन्होंहे प्रणाम करते हुए अपने होंटो से छुआ तो उन्हें बिलकुल बर्फ जैसा सर्द पाया। कोल्ड वेव्स के दिन थे वो। शमशान से घर लौटे तो गीज़र बन्द कर ठन्डे पानी से नहाये । उसके बाद चाहे कितनी ठंडक क्यों न हो वो कभी गर्म पानी से नहाय ही नहीं। अपने सारे गरम कपडे बाँट दिए और कोल्ड वेव्स में भी बघैर बनयान के सूती कुरता या क़मीज़ पहनते थे। कहते थे उस दिन पापा के बर्फ जैसे पैरों को छूने के बाद सर्दी से हमारा ख़ूनी रिश्ता हो गया है।
पापा की अस्थियों का विसजर्न करना तो दूर की बात कोई उसका ज़िक्र तक नहीं कर सकता था। कहते थे हम भी यहॉ चाहेंगे के हमारा बेटा भी इसी तरह हमारे relics मेन्टेन करे।
एक दिन सुबह से ही डॉक्टर नारायण किताबों से भरे इस कमरे में पापा की अस्थियों वाले कार्नर के बराबर के कार्नर में कुछ जगह बना रहे थे। के देखा के दो मज़दूर नुमा लोग एक साइड कार्नर रैक लादे चले आ रहे है। जिसको ये बहुत संम्भाल के उस खाली किये कार्नर में रखवाने का इंतज़ाम करने लगे।
कि घर के किसी नौकर ने इनकी बीवी को खबर करदी। वो tantani हुई आई और बोली ये क्या है। उस रैक की तरफ बड़ी हसरत सर देखते हुए इन्होंने कहा मेरी आरामगाह। बीवी ने पापा वाली हंडिया की तरफ हाथ जोड़कर कहा अब यही काफी थे के अब तुम भी अपने बैठने का इंतज़ाम कर रहे हो। बोले आप गंगा जी में बेहतर जाइयेगा मगर हमतो यही रहेंगे अपनी फ्यूचर gererations के साथ। ये बाते हो ही रही थी
के दिल्ली से छुट्टिया मानाने आया हुआ उनका बेटा आ गया। इनकी बीवी ने उसकी तरफ देखते हुए कहा लो अब एक और कार्नर आबाद करने का प्रिग्राम है। बेटे ने पापा की हंगिया के तरफ दिखाते हुए डॉक्टर साहब से कहा पापा अब इस बात और क्यों बड़ा रहे है। पापा वैसे भी इस घर में बहुत सामान है जबतक ये सरकारी बंगला है तो ये सब ठीक है। फिर जबतक अपना घर बनकर तैयार होगा इतना सामान लेकर हम कहाँ जायेंगे। इस वक़्त तो हममे अपनी हिस्ट्री से ज़्यादा जियोग्राफी की फ़िक्र करनी चाहिए। किराये पर कौन मकान देगा हममे वो भी इन दो दो आत्माओं के साथ। फिर बोला सॉरी पापा you live for thousand years. वैसे भी हुमलोग कौन से गांघी, नेहरू या आंबेडकर है जिनके relics सजाय जाये। हमारी अगली gererations फॅमिली albems रद्दी में न बेच दे यही बहुत होगा पापा।
इस बैहस् में डॉक्टर साहब अकेले पड़ गए और नया लाया हुआ साइड रैक किचेन में आलू और प्याज की आरामगाह बन गया।
एक दिन इनकी इकलौती बेटी किसी लाइलाज तो नहीं बल्कि लंम्बे इलाज वाली बीमारी में मुब्तिला हो गयी। इनकी बीवी ने ग़नीमत समझा और ज़िद पकड़ ली हो न हो बेटी का इस तरह बीमार होना घर में रखी अस्थियों का प्रकोप है। जवान बेटी की ज़िन्दगी का सवाल था लिहाज़ा पूरा ख़ानदान एक सुर में यही कह रहा था के पापा की अस्थियों को तो अब विसर्जित होना ही चाहिए। बेचारे डॉक्टर साहब कुछ दिन तक तो डटे रहे फिर एक दिन इस कॉमन प्रोटेस्ट के आगे टिक न सके।
तय हुआ के अस्थियां हरिद्धार में विसर्जित होंगी। अब डॉक्टर साहब इस इंतिज़ाम में लग गए। हर चीज़ को बेहद सलीके और precision के साथ करना उनकी आदत थी। कौन कौन इस विसर्जन यात्रा में जायेगा, कौन क्या पहनेगा, कौन किसके आगे और कौन किसके पीछे चलेगा इसका detailed planning होने लगी। ख़ाली वक़्त में डॉक्टर साहब इस पूरे कार्यक्रम के sketches भी बनाते रहते थे।
आखिर पूरा खानदान हरिद्धार पहुच गया। सब इनके डायरेक्शन के मुताबिक़ करन जौहर की फ़िल्म की तरह सफ़ेद टिंच। सबसे आगे डॉक्टर साहब हाथ में अस्थियां लिए हुए। पीछे पीछे पूरा खानदान। चार नावें की गयी जिनमें और एफेक्ट के लिए सफ़ेद चादरें बिछाई गयी। एक एक करके सभी लोग नावों में सवार हुए। पुरोहित भी साथ था। डॉक्टर साहब ने कहा अस्थियां किनारे से नहीं बल्कि गंगा की मझधार में विसर्जित की जाएँगी जैसे गांधी और नेहरू की अस्थियां इलाहाबाद के संगम में की गई थी। धीरे धीरे नावें आगे बढ़ रहीं थी के अचानक डॉक्टर साहब को इस सीन को और अफेक्टिवे बनाने के लिए कोई नया idea आ गया। अपनी जगह से उठे और ज़ोर ज़ोर से हाथ हिलाते हुए कुछ केहने लगे। पीछे की नाव वालों को उनकी बात समझ में न आ रही थी वो अब वम वो कुछ हाइपर होकर नावों में इधर से उधर ज़ोर से इस तरह चलने लगे जैसे अपने लॉन में बकरी हका रहे हों। क्या था नाओ डिस्बैलेंस होने लगी। डॉक्टर साहब के झुकने और संभलने के साथ नाओ जैसे see saw खेल रही हो। नावों के बीचो बीच सहमे खड़े डॉक्टर साहब वैसे ही लग रहे थे जैसे इनके मरीज़ इनके सामने अपने को पूरा इनके हवाले कर खामोश खड़े हो जाते थे।
डॉक्टर नारायण के मतब की एक और भी खूबी थी यहाँ फीस दी नहीं फेकी जाती थी। जो जहाँ है वही फेक दे जो भी जिसके पास हो और जो कुछ वो फीस में देना चाहता हो और कोई फीस तय न थी। सबके चले जाने के बाद एक आदमी ज़मीन पर बिखरी हुई इस फीस के रुपयों को झाड़ू से समेटता था। डॉक्टर नारायण ऐसा इसलिए करते थे ताकि इनको ये पता न चले के किस मरीज़ ने कितनी फीस दी है और ये इस बात से डरते थे के कहीं दी गयी फीस के हिसाब से मरिजों के लिए इनका एटिट्यूड न बदल जाये।
ये हमेशा अपने आप को बॉडी कहते थे। जैसे जब कभी उठकर जाने लगते तो कहते body goes now. और फोन पर अक्सर अपने आने का वक़त कुछ यु बताते थे My body will arrive at this this time.
इनकी इन ऊल जलोल हरकतों ने इन्हें अपने शहर में ही नहीं बल्कि दूर दूर तक मशहूर कर दिया था। जो भी एक बार अगर इनसे मिल लेता इनको भूलता न था।
एक बार ट्रेन में सवार हुवे पुछा कंडक्टर कहाँ है। कंडक्टर आया तो उसको एक तकिया थमाते हुए उसके कान में कहाँ। इसको अपने पास रख लीजिये इसमें आठ लाख रूपए है। अगर रात में कोई लूटने आये उसको ये दे दीजियेगा और कहियेगा के ये लो और चले जाओ मगर सोते हुए मुसाफिरों को जगाओ मत। ये सुनकर वो चुपका चला गया। कंडक्टर की ड्यूटी आधी रात को ख़त्म होनी थी मगर वो कम्पार्टमेंट छोड़ कर गया नहीं। सुबह जब वो इनके पास इनकी अमानत लौटाने आया तो डॉक्टर साहब ने उसे पुछा गए नही क्या डबल ड्यूटी कर रहे हो। वो बेचारा सहमा हुआ बोला सर आपकी अमानत छोड़कर कैसे चला जाता। इस पर डॉक्टर साहब हंसकर बोले अरे जहाँ खड़े थे वही छोड़ देते जिसकी किस्मत का होता उसे मिल जाता। इसके लिए आपको इतना परेशान होने की क्या ज़ुरूरत थी।
एक दिन किसी काम से किसी बड़े सरकारी अफ़सर से मिलने गए मगर वही अपनी ख़ास हुलिए मे यानी सर पर हैट, बदन पर सिवाय एक छोटी सी चड्ढी नुमा शॉर्ट्स के अलावा कुछ न था।। उसपर एक लेडीज़ पर्स जनेऊ की तरह पैहने हुए थे।अफसर के कमरे में स्विंग डोर यानी आधा दरवाज़ा था। जब अफ़सर को स्विंग डोर से इनका सिर्फ़ ऊपर का नंगा बदन और नीचे की टांगे दिखाई दे दी तो वो ये समझा के कोई नंगा आदमी दफ़्तर में घुस आया है। अफ़सर ने घबराकर ऐसी बेतहाशा घंटी बजाई के साहब का पूरा अमला(स्टाफ़) उनके कमरे में जमा हो गया। जब डॉक्टर साहब अंदर लाये गए तो मुस्कुराकर अफसर से बोले इटस टू हॉट टुडे। सॉरी आई एम वरड्रेससेड फ़ॉर थे सीज़न।
डॉक्टर नारायण एक सटीक जुमले बाज़ी और शरारत में भी निपुड़ थे जो वो अक्सर राह चलते अनजान लोगों के साथ भी किया करते थे। एक ऐसे ही सड़क पर सामने से आते एक बुजुर्ग से इंसान को बहुत अदब से नमस्ते किया और ठहर कर हाल चाल पूछा। उस शख़्स ने भी इनसे बढ़ी मोहोब्बत से दो चार बाते की। इस मुलाक़ात से फ़ारिग़ होकर जब डॉक्टर साहब आगे बड़े तो हमने पूछा कौन थे ये साहब? इसपर डॉक्टर साहब बोले हमें क्या पता होंगे कोई हमें अच्छे लगे हमने नमस्ते करके हाल चाल पूछ लिया।
डॉक्टर नारायण को लोगों को irritate करने में भी मज़ा आता था। मुंम्बई में किसी प्रोपर्टी का एडवान्स देने पहुचे तो एक बड़े सूटकेस के साथ जिसमे एडवांस की रक़म रखी थी। जब सूटकेस खोल गया तो उसमें पांच रुपये से लेकर सौ रुपए तक कि हर क़ीमत के नोटों की गाड़ियां थी। सूटकेस थमा कर बोले गिन लीजिये ब्लैक के नही हैं सीधे बैंक से लेकर आ रहे हैं।ज़ाहिर है नौ लाख रुपए वो भी इतनी बड़ी तादाद में कोई फ़ौरन तो गिन नही सकता था। बोले take your time हम लोग पिक्चर देखकर आते हैं। वहां से निकलकर डॉक्टर साहब ने तो पूरा दिन सैर सपाटे में बिता दिया मगर इनसे एडवांस लेने वाली पार्टी रात तक नोटों के उस अम्बार से जूझती रही। सुना है इस काम में हाथ बटाने के लिए उसे अपने कई रिश्तेदारों को बुलाना पड़ा था।
इसी तरह दादर के एक रेस्टुरेंट में खाना खाया फिर जब बिल आया जो कुछ क़रीब बारह सौ रुपयो का था। डॉक्टर साहब ने बिल देखा तो अपने बैग से एक पोटली निकली जिसमें सिक्के ही सिक्के भरे थे। वेटर ने घबराकर सिक्को को देखा तो डॉक्टर साहब बोले आज़ाद इन्दुस्तान की चिल्लर है चलती है भाई अंग्रेज़ो के ज़माने का एक भी सिक्का नही है। और डॉक्टर साहब ने वेटर से कहा बस हमारे पास इतने ही पैसे है इसी से काम चलाओ। जबकि पोटली में कई सौ रुपए के सिक्के रहे होंगे। उठते उठते बोले बिल के पैसे काट लीजिये और अगर कुछ बचे तो सो आपके अब ये आपकी किस्मत है।
एक दिन पेट्रोल पम्प पर पेट्रोल ले रहे थे तो पेट्रोल पम्प के एक पुराने कर्मचारी ने इनको सलाम किया। जवाब में डॉक्टर साहब ने फ़ौरन गाड़ी का शीशा नीचे किया और उस आदमी से पुछा ज़िंदा हो। वो आदमी बहुत ही विनमृता के साथ बोला जी सर आपकी मेहेरबानी है। क्यों ज़िंदा हो अबतक तुमको मर जाना चाहिए था कैहते हुए डॉक्टर साहब ने गाड़ी आगे बढ़ा ली।
एक दिन एक बेकरी शॉप पर गए और एक फ़रमाइशी केक का आर्डर कर दिया। आर्डर दूसरे दिन मिलना था तो डॉक्टर साहब ने सेल्स बॉय से पूछा आर्डर याद रहेगा तुम हमको भूल तो नही जाओगे। सेल्स बॉय ने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया साहब आपको कोई कैसे भूल सकता है और डॉक्टर साहब के एक्स्ट्रा लार्ज कॉय बॉय हैट, जाली वाली बनियान और शॉर्ट्स को देखते हुए बोला आपतो फिल्म के डायरेक्टर लगते हैं। ये सुनकर डॉक्टर साहब ने बैग से अपना काला चश्मा निकाला और आंखों पर चढ़ा लिया। यानी पूरे फिल्मी गेटउप में आ गए।
एक बार एक कवि सम्मेलन की सिदारत( अध्यक्षता) कर रहे थे। पूरे वक़्त डॉक्टर साहब इनतिहाई संजीदगी के साथ अपने जगह पर बैठे रहे। जब इनको बारी आई तो बोलते बोलते यकायक अपनी शेरवानी के पूरे बटन खोल दिया तो देखा क्या के डॉक्टर साहब शेरवानी के अंदर मिकी माउस वाली टी शर्ट पैहने हुए थे। क्या समा था के सफ़ेद शेरवानी के पीछे से मिकी माउस झांक रहा था। मुमकिं है उनकी ये मुद्रा डॉक्टर साहब की ख़ुद की अपनी शख़्सियत की अक्कासी (दर्शा)रही थी के कैसे एक कामयाब डॉक्टर के संजीदा चेहरे के पीछे एक इंतिहाई शोख और पुरलुत्फ़ इंसान बसता था।
एक दिन डॉक्टर नारायण हमें अपने बैंक के बाहर मिल गए। लाल गुले अनार स्लीपिंग सूट पैहने हुए थे। हाथ में छड़ी थी और गले में मोटी मोटी बीड्स का माला पैहने हुए थे। देखते ही बोले मुम्बई में क्या कर रहे हो। हमने शरारतन कह दिया मंगल को सिद्धि विनायक के बाहर और जुमेरात ( थर्सडे) को हाजी अली के बाहर बैठ जाते है काम चल जाता है। ये सुनकर डॉक्टर साहब बोले तुम इससे ज़्यादा और कुछ कर भी नही सकते हो।
कुल मिलाकर डॉक्टर नारायण एक हमदर्द, मददगार और एक राज़दार किस्म के इंसान थे। कभी किसी मरीज़ के बारे में कोई बात न करते थ्री के उसको क्या हुआ है या वो किस परेशानी में मुबतिला है। एक बात और इलाज के दौरान अक्सर मरीज़ इनके मरीज़ हो जाया करते थे। वो दिन दिन भर इनके घर में ही रहते खाना खाते, इनके दोस्तों के दोस्त बन जाते और इनके परिवार के हिस्सा सा बन जाते। इसी तरह ये भी अपने मरीजों के घर इस तरह रच बस जाते के उस घर में कोई काम इनके बग़ैर होता ही न था। मगर एक बात खास थी इस सिलसिले में के एक बार इलाज खत्म हुआ के डॉक्टर नारायण और वो मरीज़ दोनों ही ऐसे अनजान बन जाते थे जैसे कभी मिले ही न हो। मुमकिन है ये इनके इलाज का एक तरीक़ा हो ।
(लेखक कॉर्पोरेट लॉयर के अतरिक्त लेखक भी हैं )
















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