अदृश्य प्रेम की गुनगुनाहट
By Nehal Uddin Ahmad

हे प्रिय, मुझे यूँ असहाय छोड़ कर न जा – न जा,
मैं तो गहरे दुख और विषाद में समाहित हूँ।
तू तो मेरी नसों में दौड़ता है, यह मैं जानता हूँ,
फिर कोई कष्ट न दे, मैं पहले से ही दुखी हूँ।
तू हृदय के स्पंदन में है, धमनियों में बहता हूँ,
तू अदृश्य है, फिर भी दर्शन का अभिलाषी हूँ।
इस दृष्टि में, सृष्टि में, तू ही समाहित है – जानता हूँ,
फिर भी तेरे अलौकिक दर्शन का आकांक्षी हूँ।
ज़िन्दगी बहती जाती, पर तेरी याद लौट आती है,
हे प्रियतम, मेरी आत्मा तुझी को पुकारे जाती है।
कुछ ऐसा अलौकिक घटित कर, कि मेरी आँखें देख सकें,
अगोचर होते हुए तू दर्शन दे सके — यही मेरी तृष्णा है।
मैं वहीं हूँ जहाँ प्रकाश और छाया मिलते हैं,
जहाँ समय ब्रह्मांड के बीच कहीं मिलते हैं।
भीड़ में मत ढूँढ़, मैं समय से भी गतिमान हूँ,
मैं वो शांति हूँ, मैं ही तेरी आत्मा का ठिकाना…
यह कविता “अदृश्य प्रेम की गुनगुनाहट” मेरी पूर्व रचना “Whispers to Love Unseen” पर आधारित है। यह पहली बार है जब मैंने किसी कविता को हिन्दी में लिखने का प्रयास किया है। कृपया इसे विश्लेषणात्मक दृष्टि से देखें और अपनी प्रतिक्रिया दें।
Prof Nehaluddin Ahmad, LL.D. Professor of Law, Sultan Sharif Ali Islamic University (UNISSA), Brunei, email: ahmadnehal@yahoo.com
















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