मुनाफ़े की भूख इंसान की सेहत पर भारी, खाने की थाली में ज़हर घोलने वालों पर सख़्त कार्रवाई कब होगी?

खाने की थाली में क्या है? दूध में कितना दूध है, मसालों में क्या मिलाया गया है और मिठाइयों को आकर्षक बनाने के लिए किन चीज़ों का इस्तेमाल हुआ है? आम आदमी के लिए इन सवालों का जवाब जानना आसान नहीं है। वह अपनी मेहनत की कमाई से खाने-पीने का सामान खरीदता है, लेकिन इस भरोसे के साथ नहीं कह सकता कि जो कुछ वह खा रहा है, वह उसकी सेहत के लिए सुरक्षित भी है।
मिलावट सिर्फ़ धोखाधड़ी नहीं, लोगों की सेहत के साथ खिलवाड़ है।
खाद्य पदार्थों में हानिकारक मिलावट से पेट और आँतों की बीमारियाँ, विषाक्तता और दूसरी गंभीर स्वास्थ्य समस्याएँ पैदा हो सकती हैं। मिलावट का हर मामला एक जैसा नहीं होता, लेकिन जब कोई कारोबारी चंद रुपये अधिक कमाने के लिए लोगों की सेहत को दाँव पर लगा देता है, तो उसका अपराध सिर्फ़ आर्थिक नहीं रह जाता।
सबसे ज़्यादा चिंता उन परिवारों की है जो महँगा सामान नहीं खरीद सकते। गरीब और निम्न आय वर्ग के लोग अक्सर कीमत देखकर सामान चुनते हैं। वे न हर चीज़ की प्रयोगशाला में जाँच करा सकते हैं और न ही खरीदारी के समय किसी विशेषज्ञ की मदद ले सकते हैं। उनकी मजबूरी का फायदा उठाना किस तरह का कारोबार है?
छापे पड़ते हैं, लेकिन सवाल अपनी जगह कायम हैं
खाद्य सुरक्षा विभाग की कार्रवाई, नमूनों की जाँच और दोषियों के खिलाफ़ कानूनी कदम ज़रूरी हैं। लेकिन सवाल यह है कि कार्रवाई का असर कितना व्यापक और स्थायी है? क्या संदिग्ध सामान की बिक्री रुकती है? क्या जाँच में मिलावट साबित होने पर दोषियों को समय पर सज़ा मिलती है? क्या बार-बार नियम तोड़ने वालों पर प्रभावी रोक लगती है?
सिर्फ़ छापे की तस्वीरें और बरामद सामान की खबरें काफी नहीं हैं।















